Skip to main content

Posts

हिन्दू होने के नाते इतना तो कीजिए...

बाबर से लेकर औरंगज़ेब तक की देश की गुलामी जिसे इतिहास में छुपा दिया गया, अंग्रेज़ों द्वारा किए गए कार्यों को देशहित से जोड़कर पढ़ाना और हर वास्तविक जानकारी को घुमा फिरा कर परोसने के लिए इन इतिहासकारों को क्या प्रस्ताव दिया गया होगा इस बारे में कुछ कह पाना कठिन है क्यूंकि देश के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने की सज़ा देशद्रोह से कम नही हो सकती और देशद्रोह की एकमात्र सज़ा मृत्युदण्ड ही होना चाहिए, किन्तु ये इतिहासकार अपने अपने हिस्से की शान और आराम की ज़िन्दगी जी कर कहीं मिट्टी में दफ्न हो गए तो कहीं जलाकर इनकी अस्थियों का विसर्जन कर दिया गया, और मरणोंपरान्त इनके रचे गए झूठ अमर हो गए कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी विदेशी आक्रमणकारियों को ही अपना उद्धारक और देश का भूत, भविष्य और वर्तमान मान ले। क्या आपको या आपके बच्चों को पता है कि लालकिले के ठीक सामने शिवालय का निर्माण करवा कर बाज़ीराव पेशवा ने हिन्दुओं के गौरवशाली इतिकास को और भी महान बना दिया। औरंगजे़ब में साहस नही था कि वो किले से बाहर आकर बाजीराव को रोक सकता या चुनौती दे सकता, किन्तु आम जनता को औरंगज़ेब की औकात पता चल चुकी थी। देशभक्ती और बलिदा...

क्यूंकि नज़र होती ही है बदलने के लिए...

गृहयुद्ध की ओर बढ़ते इन कदमों को किसी न किसी उपाय से रोकना ही होगा, देश का प्रधान सेवक भी मौके की गंभीरता से अनभिज्ञ नही है किन्तु कोई तो कारण होगा ही कि फिलहाल चुप है। दाउद इब्राहीम की नई तस्वीर का मिलना और ज़किर नाईक का पकड़ा जाना कहीं न कहीं चुप रहने के पीछे कोई नई कहानी बुन रहा है। कैसी कहानी...? तेल की मजबूरी, तो कहीं न कहीं पाकिस्तान के साथ नर्मी बरतने की बात पर समझौता या फिर कुछ और ही चल रहा है उस दिमाग के भीतर? वोट देकर अफसोस करने वालों को कल एक बार फिर अपने अफसोस पर भी अफसोस होगा। युद्ध के नियमों से अपरिचित लोग भी अभी नही जानते कि युद्ध का हर नियम जायज़ ठहराने के पीछे भी कई राज़ छुपे थे। आप सीधा हमला भी करते थे, भूखा रख कर फिर भोजन का लालच दिखा कर काबू कर लेते थे, आप कभी यूं भी करते थे कि जो सहूलियत आपको आपका शासक नही दे सका उन्हीं चीज़ों को देने का वायदा करके भी आप किलों के बन्द दरवाज़े खुलवा कर जीत हासिल कर लेते थे। हर हाल में जनता ही होती थी जो सामने वाले का शिकार बनती थी, कभी हिन्दू मुग़लों का और कभी मुग़ल हिन्दुओं का! ऐसे ही किसी अदृश्य युद्ध का हम और आप शिकार बने हुए हैं, समय ...

जिसका काम उसी को साजे

फिल्मी कलाकारों का बेरोज़गारी और फिल्म की असफलताओं के दौरान समय व्यतीत करने या सस्ती लोकप्रियता की चाह ने फिल्म को जाने अंजाने राजनीति से जोड़कर देखना आरंभ कर दिया , सारी गंदगी की शुरूआत यहीं से हुई। देखते देखते अचानक 1995-96 में ऐसा दौर आया कि संपूर्ण कला जगत पर राजनीति तेज़ी से हावी होने लगी , और आज ये हाल है कि हर किस्म के छोटे बड़े भूले बिसरे और अपने खत्म होते करियर को सीधा जनमंच पर चमकाने के लिए हर क्षेत्र हर कला से जुड़ा कलाकार और व्यवसायी राजनीति का हिस् सा बन जाता है। दो नावों पर पैर रखने का नतीजा कांग्रेस के समय में लोग अमिताभ बच्चन और भाजपा के समय में विनोद खन्ना की शक्ल में देख चुके हैं , या तो आप देश सेवा करें या आत्म सेवा , या व्यवसाय करें या राजनीति या तो आप कुशल कलाकार है या फिर कुटिल राजनीतिज्ञ आप दोनों नही हो सकते , कभी नही। अगर आप की जीभ अचानक देश और धर्म के प्रति ज़हर उगलने लगी है तो आपको राजनीति की छूत लग चुकी है और अब आप कलाकार की श्रेणी से बाहर हैं , केवल अपनी बात को रखने के नाम पर जो स्वतंत्रता हमारे भारत का संविधान देता है उसका दुरपयोग करना यदि आप सीख गए हैं तो ...

उन्हें पसंद है फटे में टांग डालना

वो जो कल तक साथ थे आज खिलाफ हो गए , जिन्हें राजनीति का ' र ' नही आता वो देश चलाने के तरीके पर राय बरसा रहे हैं। जो भाजपा को देश तोड़ने की राजनीति करने वाली पार्टी कह रहे थे वे आज मुसलमानों के उद्धार और उत्थान की बात पर तड़प रहे हैं। अभी तो सिर्फ सबका विश्वास जीतने की बात हुई और अभी से ही सबके साथ विश्वासघात भी हो गया। तकलीफ तब होनी चाहिए जब अपने घर से छीन कर किसी दूसरे को मिल रहा हो , यहां तो सिर्फ उन्हें वो दिया जा रहा है जिसे वो कभी पा ही नही सके और दूसरों को भी नही दिया गया ये कह कर कि ये किसी की अमानत है और इसी डायलॉग के साथ 70 वर्ष तक सिर्फ विश्वास और विश्वासघात का खेल होता रहा , कभी अपने साथ कभी उनके साथ , दोनों के हिस्से की रोटी छोटी होती गई पर कांग्रेस का तराजू कभी बराबर न हो सका। बराबर होता भी तो कैसे ? देश की उन्नित के नाम पर बार बार , हर एक भारतीय के अधिकार से टुकड़े काट काट कर वो अपना पार्टी फण्ड भरते रहे जिससे चुनावों के खर्चे भी जनता की ही जेब से पूरे हो जाएं और जो बचे वो स्विस खातों की शोभा बढ़ाएं। असल में जनता स्वयं ही नही जानती कि उसे शिकायत करनी किस...

पाकिस्तान जैसे नामर्द का कैसा मान और कैसी मर्यादा ?

पाकिस्तान को दी गई सारी रियायतें और सुविधाएं अब खत्म की जा रही हैं, ऐसे में पाकिस्तान का छटपटाना स्वाभाविक है। भारत से पाकिस्तान के हाईकमीशन को वापस बुलवाना और उसे सामान्य चर्चा का नाम देकर खामोशी का माहौल बनाए रखना आने वाले तूफान के पहले की शान्ति जैसा महसूस हो रहा है। ये और बात कि ये तूफान अब आखिरी बार उठेगा और इस बार ये भारत से पाकिस्तान की ओर दौड़ेगा, शत प्रतिशत कामना है कि इन भीषण हवाओं की चपेट में आकर पाकिस्तान नाम की ये बीमारी भी कहीं लोप हो जाए। यूं भी भारत की बढ़ती जनसंख्या को अब और भी बड़े भारत की आवश्यक्ता है, तो क्यूं न अपनी पुरानी ज़मीन पर ही बसेरा बसाया जाए। आश्चर्य तो इस बात का है कि भिखारियों सा कटोरा लेकर पूरे विश्व से भीख मांगने वाला देश न जाने कैसे और कहां से इतने महंगे विस्फोटकों की व्यवस्था कर लेता है? पाकिस्तान पर सीधा हमला करना या न करना बेशक हमारी सेना के निर्णय क्षेत्र में आता है इसमें हमारे आपके चिल्लाने या सलाह देने से बात नही बनने वाली। दूसरी तरफ कुछ बातें उनकी भी हो जाए वास्तव में जिनकी शय और मदद से पुलवामा जैसी भयानक घटनाएं आतंकियों के लिए बहुत आसान हो...

तो आप भी दूसरे इंसान को खाईए

जानवरों के पीछे पड़े इंसानों को देख कर मन में बड़ी अजीब भावनाएं उत्पन्न हो रही है , ऐसा महसूस हो रहा है कि अब दोनों के रहन-रहन और सोच में ज़्यादा फर्क नही रह जाएगा। वैसे भी सेक्स और बलात्कार के मामले में इंसान ने जानवर को बहुत पीछे छोड़ दिया है , बस थोड़ा खाने पीने और रहने पहनने भर का फर्क रह गया है वह भी पट जाएगा। आती जाती पीढ़ी का फटा-चिथड़ा पहनावा भी नंगेपन की नई परिभाषा को जन्म दे रहा है , लिहाज़ा कपड़ों का महत्व अब अधिक रह नही गया है , रही बात रहन सहन की उसमें भी लिव-इन रिलेशनशिप जानवरों से ही प्रभावित है। शादी-ब्याह का घटता महत्व आए दिन तलाक़ और पति-पत्नि के अलगाव से जुड़े मुद्दों की बढ़ती संख्या साफ इशारा दे रही हैं कि हमारी देशी संस्कृति किस ओर बह रही है और खाने-पीने की तो बात ही न कीजिएगा , जो घी रोटी पर लगा कर मां बचपन से जवानी तक मज़बूत शरीर तैयार करती रही अब उसका नाम ‘‘ हार्मफुल फैट ’’ हो गया है। लेकिन जानवर पैदा होने से लेकर मरने तक वही भोजन करता है जो उसने अपनी मां के साथ खाना सीखा , अब मान भी लीजिए कि जानवरों का सम्मान करना बनता है क्यूंकि वे आप और हमसे बेहतर हैं। उन्हें मार काट...

दक्कन जीते बगै़र भाजपा न होगी राष्ट्रविजेता

 दक्कन के नासूर ने औरंगजे़ब की जान ले ली...स्वघोषित आलमग़ीर (विश्वविजेता) का राष्ट्रविजय स्वप्न अधूरा ही रह गया। जिस-जिस की नज़र उस ओर थी वो कभी सलामत नही रहे, द्राविड़ ही वास्तविक हिन्दु स्थान है जहां से भारत के उस विशाल स्वरूप का प्रारंभ होता है जिसे सही मायनों में स्वदेश की संज्ञा दी जा सकती है। हमारे लिए पाश्चात्य कोई सभ्यता हो सकती है किन्तु दक्षिण भारत, अंग्रेज़ी को मात्र भाषा और विदेशी चाल-चलन को दिमाग़ी फितूर का नाम देता है, जिनके भीतर तनिक भी राष्ट्रधर्म जीवित है वे ही दक्षिण के इस स्वरूप को देख पाते हैं, अन्यथा सड़क के किनारे फास्टफूड समझकर इडली-डोसा की प्लेट में दक्षिण भारत को खोजने वाले लोगों की उत्तर भारत में कमी नही है। दक्षिण भारत किसी व्यंजन का नाम नही, दक्षिण भारत तो वह अजेय दुर्ग है जिस पर विजय पाकर वास्तविक राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी बनने की चाह न जाने कितने ही राजनीतिक दलों का प्रमुख ध्येय रहा होगा। भाजपा का अगला पड़ाव बंगाल से कहीं ज़्यादा कठिन सिद्ध होगा, राष्ट्रविजय का स्वप्न लिए भाजपा अब भारत के उस हिस्से को बढ़ रही है जहां उसे अपनी सारी कूटनीति, अनुभव और...