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जो जीवन जीना सिखाए वही गीता है


स्कूलों में गीता अध्ययन आरंभ किए जाने पर विवाद जारी है, इसके असंख्य कारणों में से प्रथम पूर्वाग्रह से ग्रस्त कायर लोगों का दल जिन्हें लगता है कि गीता किसी विशेष वर्ग अथवा जाति हेतु है, इसके अलावा कुछ वो लोग जो हिन्दुत्व और हिन्दुवाद के ढोंग करते हैं परन्तु गीता को कभी हाथों में उठाने का भी कष्ट नही किया होगा, पढ़ना तो दूर की बात है। यदि वास्तव में गीता को अध्ययन पाठ्यक्रम में लाया गया तो यह बच्चों को स्कूली पढ़ाई से कहीं अधिक सशक्त ज्ञान प्रदान करेगा, भले ही इसे किसी भी भाषा में अनुवाद कर पढ़ाया जाए। जीवन जीने के सिद्धान्तों का परिचय है गीता, ईश्वर को समझ पाने का सरल उपाय है गीता, जिजीविषा ही ईश्वर है अर्थात जीवन को जीने की इच्छाशक्ति ही ईश्वर है, काम क्रोध पर नियंत्रण का एकमात्र ज़रिया है गीता, मनुष्य को यह समझाने कि वह स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी, यह भी कि किस प्रकार वह मृत्यूलोक में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, हम जीवन भर केवल सुख खोजने के लिए गीता पढ़ते हैं और यह भूल जाते है कि गीता को कहने वाले महागुरु महाराज कृष्ण को जीवन भर सुख की प्राप्ति न हो सकी, दुःख और सुख में समान अवस्था पाने की शक्ति है गीता अर्थात दुःख भी हों तो भी जिजीविषा में लेशमात्र भी प्रभाव न पड़े, धर्म रक्षा के लिए शस्त्र उठाने की बात है परन्तु धर्म निर्वाह के पूरे ज्ञान के पश्चात ही ऐसा किया जाना चाहिए, ऐसा नही कि अपनी सोच को जबरन दूसरों पर धर्म के रूप में थोपने या उनके धर्म को छोटा या नीचा दिखाने के लिए, न किसी का अधिकार हनन किया जाए न अपना अधिकार हरण होने दिया जाए। मनुष्य को स्वतंत्रता के साथ स्वयं को नियंत्रित एवं अनुशासित करने का माध्यम है गीता। केवल मानसिक ही नही शारीरिक रूप से कर्मों का निर्वाह करने का उपाय भी है गीता, खन-पान पर नियंत्रण, सोने जागने पर नियंत्रण, स्वभाव पर नियंत्रण, पहनावे पर नियंत्रण, योग-ध्यान पर नियंत्रण अर्थात चंचल मन पर नियंत्रण एवं संतुलन, अन्य तमाम कार्याें पर नियंत्रण एवं पूर्ण संतुलन बनाने का एक मात्र उत्तर है गीता, अब इन बातों से यह कहीं से भी नही लगता कि गीता का किसी प्रकार से किसी धर्म विशेष से संबंद्ध है ये सब तो मनुष्य मात्र के लिए अति आवश्यक है ही। जीवन को सफलतापूर्वक उद्देश्य की पूर्ति जिसके लिए आपका जन्म हुआ है और पुनः ईश्वर की सानिध्य प्राप्ति के लिए है। हिन्दु, सिख, ईसाई आदि नाम ही धर्म का वास्तविक अर्थ है क्या? क्या कर्तव्य पालन-निर्वाह धर्म नही होता? क्या संतुलित जीवन धर्म नही कहलाता? क्या न्यायपूर्ण, दयावान, दानी, सेवाभाव, सहायता की भावना, क्षमाशील स्वभाव आपको धार्मिक व्यक्ति कहलाने का अवसर नही देता? क्या परिवार रक्षा धर्म नही? संतान का पालन पोषण धर्म नही? माता-पिता का आदर सेवा धर्म नही? क्या प्रयोजनानुसार धन कमाना धर्म नही? मंदिर शब्द को गीता में नही खोजा जा सका जहां लोग धर्म को खोजने जाते हैं...पूजा का एक निश्चित स्थान होना चाहिए जो स्वच्छ हो पवित्र हो सांसारिक गन्दगी और सोच
से परे हो पर धर्म भी सिर्फ यहीं तक हो ऐसा तो बड़े आश्चर्य की बात लगती है। हम जो धर्म को मात्र नाम से जानते हैं, हम सबके लिए गीता को पढ़ना अति आवश्यक है, साथ ही विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर इसका प्रचार भी और अधिक किया जाना चाहिए और अगर आपने पढ़ा हो तो पुनः पढ़ना नितांत आवश्यक है कारण यह कि आपने इसे सिर्फ पढ़ा समझा बिल्कुल भी नही...

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