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हंसी खुशी भूल चुके...इसमें राजनीति का क्या दोष?


मनुष्य हंसना भूल गया है, हांलाकि इसका एहसास मुझे अतिरिक्त बुद्धि के श्राप से ग्रस्त एक व्यक्ति ने करवाया फिर भी उसको कोसना नही बनता। वास्तव में मुझे इस बात का प्रमाण मिला कि व्यक्ति खुश रहना ही नही चाहता, प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता की भी उसे कोई आवश्यक्ता नही क्यूंकि वह जानता ही नही कि वह चाहता क्या है?
जिस ओर उसे अपनी मानसिकता का एक प्रतिशत भी प्रभाव दिखता है वह उसी ओर लुढक जाता है, मतलब मर नही जाता बस थाली के बैंगन सा लुढ़क जाता है। हमारी समस्या यह है कि हम जानते भी नही और निर्णय भी नही कर सकते कि सही क्या है और ग़लत क्या? हम बस इतना जानते हैं कि जो हम मानते हैं बात वही है और अपनी सोच, दृष्टि एवं क्षमता के अनुसार प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने का वरदान तो ईश्वर ने बिन मांगे ही हमें दिया है। बिल्कुल किसी कैद में पल रहे जीव की तरह जो बंधन को ही जीवन मान लेता है।
कोई बुरा होता ही नही केवल उसके कर्म बुरे होते हैं और लोग भी एक के बाद एक पीढ़ी दर पीढ़ी कांग्रेस को ही कोसते आए हैं, असल में बुराई कांग्रेस या कांग्रेसियों में नही उनके कर्मांे में रही। ऐसे ही सपा, बसपा, भाजपा फिर कम्यूनिस्ट वगैरह वगैरह आप जिस भी पार्टी या नेतृत्व के हों, उसी के होकर रहिए बस कर्मों से बचिए। किसी का साथ छोड़ने की आपको ज़रूरत नही, साथ छोड़ने का मतलब अब आप जानबूझकर बुरा करने को उतारू हैं। जहां हैं, जिन भी सिद्धांतो के साथ हैं वही रहिए, तभी तो जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त होता है। आप हंसना, खुश रहना सीख जाते हैं अन्यथा विवाहेत्तर संबंधों की भांति हमेशा दोगले और धोखेबाज़ कहे जाने की चिन्ता में फंसे रहते हैं।
आपसे बात करना किसी को क्यूं अच्छा लगता है क्यूंकि आप जहां हैं और जिस किसी से भी जुडऋे हैं, वहां की हर अच्छी बुरी बात से आप भली भंाति परिचित हैं और सामने वाले से स्वयं के विचारों की रक्षा करने में भी सक्षम हैं क्यूंकि आप भागे नही, चिढ़े नही और अभी भी हंसना जानते हैं। जिसका परिचय वास्तविकता से हो चुका हो वो कभी क्रोध नही करता, क्रोध आपको वास्तविकता देखने ही नही देता।
#बातएकअर्थअनेक

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