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शायद बलात्कार कुछ कम हो जाएँ...!

अब जब बियर बार खुल ही रहे हैं तो शायद बलात्कार कुछ कम हो जायेंगे, क्यूंकि बलात्कार करने का वक़्त ही  नहीं बचेगा...शाम होते ही शर्मीले नवयुवक बियर बार के अँधेरे में जाकर अपने ह्रदय की नयी उत्तेजना को थोड़ा कम कर लेंगे वहीँ वेह्शी दरिन्दे जिन्हें औरत की लत पड़ चुकी है, वो सस्ते में ही अपना पागलपन शांत कर सकेंगे. इसी बहाने देर रात आने जाने वाली मासूम बहनें शांतिपूर्वक सडकों पर आजा सकेंगी क्यूंकि सारे नरपिशाच तो बियर बारों में व्यस्त होंगे. पढ़के थोड़ा अजीब तो लगेगा पर ये उतना बुरा नहीं है जितना लगता है, कम से कम मासूम  और अनिच्छुक लड़कियों से जबरन सम्भोग करने वाले पिशाच अपनी गर्मी शांत करने के लिए उन औरतों का सहारा लेंगे जिनका घर ही इस वेश्यावृत्ति के काम से चलता है. उन औरतों को दूसरा काम देने और सुधरने की सोच काम नहीं आ सकेगी क्यूंकि उन्हें ये काम रास आने लगा है. मैंने काफी समय पहले २००५ में  जब बियर बार बंद करवा दिए गए थे तब इनमे से कुछ से बात भी की थी, वो अब आदत से मजबूर थीं और काम बंद हो जाने से बेहद परेशान लिहाज़ा उन सबने अपनी छोटी छोटी कोठरियों जैसे रिहाइशी स्थानो...

मंटो को ना पढ़ना तुममें हिम्मत नहीं है

पढ़ते हुए दम घुटने लगा, यूँ लगा की बस अभी मतली हो जाएगी, बताऊँ क्यूँ? क्यूंकि सच को बर्दाश्त करने की अब हिम्मत नहीं रही. वो भी ऐसा सच जो किताब के पन्नों में ही दबा रह गया... जब गड़े मुर्दे उखाड़े जायेंगे तो बू आएगी ना, वो जो मंटो को बदनाम और घटिया मानते हैं उनके साथ भी यही हाजमे वाली दिक्कत रही होगी. बड़ा मुश्किल काम है पढ़ना और उससे ज्यादा मुश्किल है पढ़ी हुई कहानियों को समझना क्यूंकि कुछ घंटो के लिए सोच ही बदल जाती है. धर्म जात ईमान पर ऊँगली उठाने की ताक़त ही ख़त्म हो जाती है, एहसास होने लगता है की तीन उँगलियाँ अपनी ओर भी इशारा कर रहीं हैं. बच के कहाँ तक भागेंगे...! उसी गन्दगी का हिस्सा हैं हम जिसे बरसों तक हममें से कोई भी साफ़ नहीं कर पाया क्यूंकि ये गन्दी नाली सा बुज्बुजता कीचड़ हमारे दिलोदिमाग के आस पास पिछले ६७ सालों से जमा हुए जा रहा है. हम नयी नयी नालियां खोदकर इस गन्दगी को बहार के बजाये और भीतर ले जाने का रास्ता बना रहे है, इसकी बदबू की आदत अब शराब का नशा सा बन चुकी है ज्यादा पी लो तो सुबह कसम खाते हैं की आज से पीना बंद और शाम हुई तो प्यास से गला सूखने लगा की एक प...

हमें अच्छा लगता है जब पेट में दर्द होता है

        हमें अच्छा लगता है जब दूसरों के मामले को लेकर हमारे पेट में दर्द होता है। आखि़र हम मीडिया वाले जो हैं। विवादित जोड़े और मीडिया वालों में काफी समानता दिखाई देती है। कारण दूसरे निजी जीवन में क्या कर रहे हैं इससे हमारा पेट दुखता है और हम चाहते हैं जब हम कुछ करें तो सबका पेट दुखे। जनता भी कम समझदार नही है, किसी को ज़ुकाम है तो पहले मीडिया के पास जाता है फिर डाक्टर के पास, किसी का अपने पति से झगड़ा हो गया तो पहले मीडिया के पास फिर वकी़ल के पास, घर में चोरी हो जाए तो पहले मीडिया के पास फिर पुलिस के पास और नई खोज के अनुसार अब मीडिया सास-बहू के झगड़े भी निबटाएगी। पति-पत्नी के बीच षास्त्रों के अनुसार किसी को भी मध्यस्थता करने का अधिकार नही है,उनकी संतान तक इसकी अधिकारी नही होती परन्तु अब नवीन षास्त्रों के अनुसार मीडिया के हस्तक्षेप के बिना किसी भी घर का झगड़ा नही निबट सकता। भाई-बहन में भी निबटारा अब मीडिया ही करवाएगी। भले ही वे 5 वर्ष के हों या 50 वर्ष के, अपहरण का मामला हुआ तो पहले मीडिया फिर पुलिस। मैं इसके पक्ष में तो हूं कि हमारे देष की संपूर्ण प्रषासनिक एवं का...

भारतीय रंगमंच और सिनेमा में नारी

सिनेमा के पहले रंगमंच के ज़रिए ही मानवीय भावनाओं का प्रदर्षन किया जाता था। शुरूआती दौर में नाटकों में भी सिनेमा की तरह पुरूष ही स्त्री पात्रों के रूप में भावाभिव्यक्ति करते थे। इसे देखकर कलाकार के कला की सराहना तो की जाती थी परन्तु अन्ततः एक अधूरापन और असंतोष सा मन में घर किए रहता था। एक समय बाद जब स्त्रियां भी रंगमंच पर उतरीं तो मानो नाटकों या नृत्यनाटकों में प्राण का संचार हो गया। यह तो होना ही था पुरूष की जिजीविषा जो अब उसके साथ थी। बंगाल का ‘न्यू थियेटर्स ञ उन दिनों नाट्य कला के क्षेत्र में सर्वाधिक सम्मानित स्थान पर था और गिरीषचन्द्र घोष जैसे नाटककार ने पहली बार अपने नाटकों में स्त्री का समावेष किया। ठाकुर गिरीषचन्द्र के नाटक देखने के लिए दक्षिणेष्वर से कोलकाता जाया करते थे और उन्होंने रंगमंच की प्रख्यात नायिका नोटी विनोदिनी के अभिनय की बड़े उदार मन से सराहना भी की थी। ठाकुर का मानना था कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्री का एक महत्वपूर्ण स्थान एवं पृष्ठभूमि होती है जिसे उन्होंने अपने जीवन में मां शारदा के साथ निभाया। ...मुश्किल ये थी कि फिल्मों में नारी प्रवेश एक लम्बे समय...

कुत्तों के लिए नही है सरकार...!

कुत्तों पर नही लागू होता सरकारी कानून। कुत्ते हैं तो क्या हुआ? बिना बात के ही काट खाते है तो भी क्या? ये काम तो सरकार की नौकरशाही भी करती है,फिर भी ऐसी फौज के रहते पुलिस महकमें को आम जनता पर छोड़ दिया गया है। बहरहाल यहां हम कुत्तों की समस्या पर चिन्ता व्यक्त कर रहे थे...कि कुत्तों से इतना भेदभाव क्यूं? विदेशी हैं तो खाने को विदेशी खाना, सोने को बिस्तर, खेलने को गेंद, नहाने को शैम्पू-साबुन, गर्मियों में ए.सी.-पंखे का सुख और जाड़ों में पहनने को गर्म कपड़े मानो कुत्ते न हुए नौकरशाह अफसर हो गए और हमारे देशी कटखन्नों का क्या? उन्हें तो दलितों जितना सुख भी नसीब नही। यदि मनुष्यों में एस.सी.एस.टी हो सकता है तो कुत्तों में क्यूं नही हो सकता। मनुष्यों के घरों में 10 बच्चे हो सकते हैं और विदेशी कुत्तों से बच्चे पैदा करवाने के लिए हजारों रुपए खर्चे जाते हैं तो फिर उनके देशी भाइयों की बिना पूछे नसबन्दी क्यूं करवा दी जाती है जबकि इन्सान को इस काम के भी पैसे मिलते हैं। सबसे अधिक दुःख तो तब होता है जब सरकार द्वारा योजनाओं की घोषणा होती है और उनमें कुत्तों के लिए कुछ नही होता। चलो आजतक न सोचा न सही पर क...

चाय के कप से देष को बाहर निकालो

देष को जगाने के पहले स्वयं जागें पर कैसे? ये मुई नींद आंखों पे ऐसे चढ़ी बैठी है कि 65 साल बाद भी पलकें खुलने का नाम भी नही लेतीं। हां 15 अगस्त को एक बार अंगड़ाई ज़रुर ले लेते हैं, फिर 26 जनवरी भी तो आती है, पर वो तो मेले जैसा होता है। चलो काम बन्द छुट्टी का माहौल और सब परेड देखने जाते हैं, या फिर घर पे ही चाय का मज़ा लेंगे। कांग्रेस ने महंगाई बढ़ा दी, भाजपा तो किसी लायक नही रही, बसपा सरकार ने प्रदेष को भिखारी कर दिया, सपा ने माफियाराज पर लगाम नही कसी, पेट्रोल महंगा हो गया, सलमान खान कब शादी करेगा?, करीना को सैफ से ब्याह नही रचाना चाहिए, होम लोन और महंगे हो गए, सब्जि़यां महंगी हो गईं और... वगैरह...वगैरह। कितनी चाय पीयोगे बन्धुओं? चाय की चुस्कियों में ही देष चलाओगे और देष का भविष्य भी तय कर दोगे। इस वर्ष भी वही रवैया, अभी मई 2012 में दुनिया खत्म होने वाली थी तो टूटी और दरार पड़ी दीवारों पर तनिक वाॅल पुट्टी चिपका कर रंग-रोगन करवा लिया कि लोग आवेंगे चाय चर्चा पर तो क्या कहेंगे फिर विधान सभा चुनाव आ गए, मायावती की सरकार क्यूं गिरी, अखिलेष की सरकार कितने दिन चलेगी भला, राजेष खन्ना का निधन...

चाहिए एक और उधम सिंह !

Udham Singh[middle] after shooting Govn.Dwayer सन् 1940 लंदन के ओल्ड वेली कोर्ट के बन्द कमरे की अदालत में एक मुकदमा चल रहा था। ‘‘मुझे इस बात की कोई परवाह नही है कि मुझे दस-बीस साल कैद या फांसी की सजा मिलती है। मैंने तो केवल अपना कर्तव्य पूरा किया है।’’ फिर उसने चिल्लाकर कहा... ‘‘मैं ब्रिटिष साम्राज्यवाद को मुर्दाबाद कहता हूं। यदि तुम्हारे अंदर इंसानियत बची है तो तुम सबको डूब मरना चाहिये। तुम जंगली, खून पीने वाले खुद को सभ्यता का ठेकेदार कहते हो...? लेकिन तुम लोग हरामजादे और दोगले हो।’’ अदालत में जज की कुर्सी पर बैठा एक तरफा फैसला सुनाने को तैयार जज एटकिन्सन ने जवाब दिया--- ‘‘मुझे तुम्हारी सियासी बकवास नही सुनना। इस मुकदमे के बारे में अगर तुम्हे कुछ कहना हो तो वही कहो। जो कुछ तुम बोल रहे हो वो कहीं प्रकाषित नही होने वाला।’’ यह सुनकर वह दहाड़ा - ‘‘मुझे मृत्युदण्ड की परवाह नही है, ना ही मुझे इसकी चिन्ता है। कटघरे की मुंडेर पर मुक्का मारते हुए वो गरजा - ‘‘मैं मौत से नही डरता मुझे अपने मरने पर गर्व है, क्योंकि मुझे अपना देष आजाद कराना है। जब मैं नही रहूंगा तब मेरे हजारों देषवासी मे...