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अँधेरे का सच

हर बार सच एकदम वैसा नही होता जैसा उसे आपके सामने परोसा जा रहा हो, हमारे साथ अनिष्ट या दुर्घटना तभी होती है जब हमसे उस घटना के बराबर ही कोई अपराध अथवा भूल हुई हो. "The third of Sir Issac Newton's laws of physics; Every Action has an Equal and Opposite Reaction" उस रात की कहानी शहर से गाँव की ओर बढ़ने वाले विकृत आधुनिकता की कलम से लिखी गयी थी. जवानी किसी रिश्ते के दबाव में नहीं आना चाहती, ज़रूरतें पूरी हो जाएँ किसी भी कीमत पर बस इतना ही सोचता है एक युवा मन, इसी ज़रूरत के पीछे पीछे चलते हुए ये दोनों बहने आधी रात घर की देहलीज़ लांघ गयीं. वास्तव में इन दोनों लड़कियों की योजना पहले से ही खेतों में जाकर अपने प्रेमियों से चोरीछुपे मिलने की तय थी बस थोड़ी सी चूक हो गयी. उसी दौरान उस इलाके से गुज़र रहे कुछ दूसरे लोगों की निगाह उनपे उस अवस्था में पड़ी जिसके बाद प्रेमी जोड़ों का वहाँ से भाग पाना असंभव हो गया, लड़कों की पिटाई के बाद उन दोनों लड़कियों के साथ बड़ी बेरहमी से सामूहिक बलात्कार किया गया, अब बारी थी एक अपराध को छुपाने के लिए दूसरा अपराध करने की, लड़कियों के लिए गांववालों के परिचित चेहर...

इस बार सभी कलमकार हैं तैयार

  मोदी जी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेनेवाले हैं, देश के समस्त कलमकार भी तैयार हैं जी, वो अपने भाई मोदी जी हर साक्षात्कार में पत्रकारों को डांटते रहे की आप लोग बिना रिसर्च के सवाल क्यों पूछते हैं?, जाइये जाकर डेटा सर्च कीजिये थोड़ा और अध्ययन कीजिये आपको अपने हर सवाल का जवाब मिल जायेगा। तो इस बार सारे पत्रकार बंधुवर केवल मोदीजी के ही रिसर्च में जुटे हैं, जिससे अगले इंटरव्यू में तगड़ी फटकार ना सुननी पड़े. और साथ ही अबकी बार प्रधानमंत्री उन सवालों के जवाब देने से ना बच सके जिन सवालों से भाजपा का प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बच गया था। अपने दोनों हाथ हवा में उठा कर हलकी मुस्कराहट के साथ ये कहना की "मैंने कब मना किया है जी, आपके हर सवाल का जवाब मैंने दिया है और आगे भी दूंगा..." और फिर बड़ी चतुराई से सवाल पूछने वाले की बुद्धि को ये कह कर चुनौती देना की "आप होमवर्क करके आइये फिर सवाल पूछिये " भाई श्री मोदीजी की ये अदा भी हम पत्रकारों के लिए कम लुभावनी नहीं है. सालों बाद कोई मिला है जो पत्रकारों से छेड़छाड़ करने में विश्वास रखता है उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सवाल पूछने के लिए उकसात...

मारो वोट की चोट

मतदाताओं की लम्बी कतार ने इस बार के मुकाबले का नतीजा लगभग बता ही दिया है. कड़ा जवाब मिलेगा इस वोट की चोट से ,   बीते १० साल बर्दाश्त की सीमा पार कर चुकी जनता ने पोलिंग बूथ के बहार अपनी संख्या से ही साबित कर दिया की जो देश के सगे नहीं उनका स्वागत करने को हम   तैयार   नहीं   है. तेज़   धूप   भी   किसी   के मार्ग में बाधा नहीं है. हाथ में पानी की बोतलें और सर पे तौलिये ढँक कर खड़े लोग किसी क्रांतिकारी सेना का हिस्सा लग रहे हैं , इन्हे देख कर स्वयं को देश का हिस्सा कहने पर अद्भुत सुख और संतोष की अनुभूति हो रही है. वोट डालते ही एक ज़िम्मेदार और महत्त्वपूर्ण देशभक्त हूँ ऐसा लगने लगता है. औरतें घर में नहीं बैठी हैं बल्कि सदल-बदल निकली हैं ये बताने की अब ५०% वोट उनके हैं ४९% नही... जिनके नाम लिस्ट   में नहीं हैं वो गुस्से में हैं विरोध कर रहे हैं बता रहे हैं की इस बार वोट नहीं डाला तो देश का कितना बड़ा नुक्सान हो सकता है , पहली बार के युवा वोटर अपने साथ दूसरे लोगों के नाम की पर्चियां ढून्ढ कर दे रहे हैं की कोई वोट छूटने ना पाये। शायद ऐसे ही देश के इसी तर...

तैयार हो जाओ देशवासियों वोट की छुट्टी मिलने वाली है

बिना बात भला पिछली बार कब छुट्टी मिली थी, इस बार भी इस छुट्टी को लाईन में खड़े रह कर बर्बाद मत होने देना। ऐसा नहीं करोगे तो फिर से देश में घोटाले कैसे होंगे, घोटाले बंद हो गए तो सुबह की चाय के साथ अखबार में क्या पढोगे? कैसे मेहेंगाई बढ़ेगी, कैसे भ्रष्टाचार बढ़ेगा, ये माँ-बेटे भाई-बहन का क्या होगा? जीजाजी की रोटी कैसे चलेगी. कैसे बाक़ी बचा देश लुटेगा  । ज़रा सोचिये इन काली स्याही के कारोबारियों का क्या होगा जो सुबह सुबह आपको चाय के साथ दिमाग के लिए नाश्ता परोसते हैं. आधा दर्जन अखबार तो इन्ही डाकुओं की सत्ता के बल पर चल रहे हैं … इनकी शान में क़सीदे पढ़ने वाले कुछ उन अखबारों और पत्रिकाओं का भी ख़याल करिये, हमे तो मनोरंजन से मतलब है अब वो चाहे कैसे भी किया जा सके. ख़बरें क्यों पढ़ते हैं हम? सोचा है कभी? ७०% लोग ख़बरें नहीं पढ़ते, वो ख़बरों में भी मनोरंजन ढूंढते हैं. खासतौर पे बलात्कार वाली ख़बरें जिन्हे हम तकरीबन १० बार पढ़ते हैं क्यों पढ़ते हैं ये तो आप ही जाने… हत्या की खबर जो दिन भर का मसाला बनता है क्यों बार बार पढ़ते हैं ये भी आप ही जाने? पर देश को लूटने वाले आगे क्या क्या और लूट सकते हैं इस ...

शायद बलात्कार कुछ कम हो जाएँ...!

अब जब बियर बार खुल ही रहे हैं तो शायद बलात्कार कुछ कम हो जायेंगे, क्यूंकि बलात्कार करने का वक़्त ही  नहीं बचेगा...शाम होते ही शर्मीले नवयुवक बियर बार के अँधेरे में जाकर अपने ह्रदय की नयी उत्तेजना को थोड़ा कम कर लेंगे वहीँ वेह्शी दरिन्दे जिन्हें औरत की लत पड़ चुकी है, वो सस्ते में ही अपना पागलपन शांत कर सकेंगे. इसी बहाने देर रात आने जाने वाली मासूम बहनें शांतिपूर्वक सडकों पर आजा सकेंगी क्यूंकि सारे नरपिशाच तो बियर बारों में व्यस्त होंगे. पढ़के थोड़ा अजीब तो लगेगा पर ये उतना बुरा नहीं है जितना लगता है, कम से कम मासूम  और अनिच्छुक लड़कियों से जबरन सम्भोग करने वाले पिशाच अपनी गर्मी शांत करने के लिए उन औरतों का सहारा लेंगे जिनका घर ही इस वेश्यावृत्ति के काम से चलता है. उन औरतों को दूसरा काम देने और सुधरने की सोच काम नहीं आ सकेगी क्यूंकि उन्हें ये काम रास आने लगा है. मैंने काफी समय पहले २००५ में  जब बियर बार बंद करवा दिए गए थे तब इनमे से कुछ से बात भी की थी, वो अब आदत से मजबूर थीं और काम बंद हो जाने से बेहद परेशान लिहाज़ा उन सबने अपनी छोटी छोटी कोठरियों जैसे रिहाइशी स्थानो...

मंटो को ना पढ़ना तुममें हिम्मत नहीं है

पढ़ते हुए दम घुटने लगा, यूँ लगा की बस अभी मतली हो जाएगी, बताऊँ क्यूँ? क्यूंकि सच को बर्दाश्त करने की अब हिम्मत नहीं रही. वो भी ऐसा सच जो किताब के पन्नों में ही दबा रह गया... जब गड़े मुर्दे उखाड़े जायेंगे तो बू आएगी ना, वो जो मंटो को बदनाम और घटिया मानते हैं उनके साथ भी यही हाजमे वाली दिक्कत रही होगी. बड़ा मुश्किल काम है पढ़ना और उससे ज्यादा मुश्किल है पढ़ी हुई कहानियों को समझना क्यूंकि कुछ घंटो के लिए सोच ही बदल जाती है. धर्म जात ईमान पर ऊँगली उठाने की ताक़त ही ख़त्म हो जाती है, एहसास होने लगता है की तीन उँगलियाँ अपनी ओर भी इशारा कर रहीं हैं. बच के कहाँ तक भागेंगे...! उसी गन्दगी का हिस्सा हैं हम जिसे बरसों तक हममें से कोई भी साफ़ नहीं कर पाया क्यूंकि ये गन्दी नाली सा बुज्बुजता कीचड़ हमारे दिलोदिमाग के आस पास पिछले ६७ सालों से जमा हुए जा रहा है. हम नयी नयी नालियां खोदकर इस गन्दगी को बहार के बजाये और भीतर ले जाने का रास्ता बना रहे है, इसकी बदबू की आदत अब शराब का नशा सा बन चुकी है ज्यादा पी लो तो सुबह कसम खाते हैं की आज से पीना बंद और शाम हुई तो प्यास से गला सूखने लगा की एक प...

हमें अच्छा लगता है जब पेट में दर्द होता है

        हमें अच्छा लगता है जब दूसरों के मामले को लेकर हमारे पेट में दर्द होता है। आखि़र हम मीडिया वाले जो हैं। विवादित जोड़े और मीडिया वालों में काफी समानता दिखाई देती है। कारण दूसरे निजी जीवन में क्या कर रहे हैं इससे हमारा पेट दुखता है और हम चाहते हैं जब हम कुछ करें तो सबका पेट दुखे। जनता भी कम समझदार नही है, किसी को ज़ुकाम है तो पहले मीडिया के पास जाता है फिर डाक्टर के पास, किसी का अपने पति से झगड़ा हो गया तो पहले मीडिया के पास फिर वकी़ल के पास, घर में चोरी हो जाए तो पहले मीडिया के पास फिर पुलिस के पास और नई खोज के अनुसार अब मीडिया सास-बहू के झगड़े भी निबटाएगी। पति-पत्नी के बीच षास्त्रों के अनुसार किसी को भी मध्यस्थता करने का अधिकार नही है,उनकी संतान तक इसकी अधिकारी नही होती परन्तु अब नवीन षास्त्रों के अनुसार मीडिया के हस्तक्षेप के बिना किसी भी घर का झगड़ा नही निबट सकता। भाई-बहन में भी निबटारा अब मीडिया ही करवाएगी। भले ही वे 5 वर्ष के हों या 50 वर्ष के, अपहरण का मामला हुआ तो पहले मीडिया फिर पुलिस। मैं इसके पक्ष में तो हूं कि हमारे देष की संपूर्ण प्रषासनिक एवं का...