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जो दिखता नही वो होता भी नही क्या?

मैंने ईश्वर को नही देखा, मैंने भूत नही देखे, हवा नही देखी और तो और घण्टों योग-ध्यान के पश्चात् भी मुझे अपनी आत्मा के दर्शन नही हुए, दूसरे तो छोड़िए मैंने तो अपनी पृथ्वी को भी नही देखा कि वो गोल है या चैकोर? परन्तु मुझे विश्वास है कि ये सब हैं ही क्यूंकि बाकी लोग बड़े दावे के साथ ऐसी ही कहते हैं। मतलब वे अप्रत्यक्ष रूप से इस बात को भी स्वीकार कर रहे हैं कि यदि कोई वस्तु व्यक्ति या घटना आंखों देखी न हो तो इसका मतलब ये नही कि वो है नही या घटित नही हुई। गुस्सा दिखे नही तो अंदाज़ा न लगाईए कि है नही, खुशी दिखे नही तो भी मत सोच लीजिए कि है नही, दुःख, द्वेष, स्वार्थ और प्रेम का भी यही हाल है, भावनाएं दिखती नही पर होती हैं। इसके ठीक उलट भावुकता स्पष्ट दिखती है जबकि वास्तविकता में वो होती ही नही जो होती तो स्थिर होती, स्वार्थ दिखता नही पर होता है क्यूंकि स्वार्थ ही सहसा भावनाओं और भावुकता दोनों को खा जाता है। झूठ होता नही पर लोग मान लेते हैं, सत्य होता है पर लोग मानते नही। सीधी सी बात है कि उसकी बनाई दुनिया में जो है उसे अकसर हम समझते हैं कि नही है और जो नही है उसे कहते हैं कि है... अब इसमें...

फिल्म को हाॅल के भीतर छोड़ आईए

एक कोई बात किसी भी कम्बल या रज़ाई से ज़्यादा गर्म होती है इतना तो मानेंगे न आप ? उदाहरण के लिए किसी भी मुद्दे की गर्मी देखिए ज़रा...हर हाथ उसे सेंकने को तैयार हो जाता है। जो मुद्दे का हिस्सा हैं उनके शरीर के हर हिस्से से पसीना टपक रहा होता है, और पारा है जो 2 डिग्री के नीचे गिरता जाता है। विवाद अदरक की चाय से ज़्यादा असरदार होता है जो हर ज़बान को गर्म रखता है और दिमाग को उबाल पर रखता है, भले ही बहस करने वालों के दिल बर्फ से ज़्यादा ठण्डे हों। किसी भी विषय को एक क्षण में राष्ट्री य स्तर पर उछालना और दो कौड़ी के लोगों को सस्ता प्रचार दिलाने की बेवकूफी करने वालों को अब क्या कहा जाए। किसी भी फिल्म की औकात उस फिल्म के एक शो के टिकट से ज़्यादा नही होनी चाहिए, आपने फिल्म देखी हाॅल से निकले और टिकट को कूड़ेदान के हवाले कर दिया न कि बाकी की सारी ज़िन्दगी उसी फिल्म के ऊपर ही बिताने की शपथ खा ली। जब हम फिल्मों पर जीवन नही बिताते तो उसे ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देने वाले काम क्यूं करने लगते हैं। हम भूल जाते हैं फिल्में सिर्फ टाईम पास का ज़रिया होती हैं, उनसे हमारी कोई भी ज़रूरत पूरी नही होती। अगर ज़रूर...

रैगिंगःस्वागत समारोह या मौत से परिचय

अमरीकन अंग्रेजी में ‘‘रैगिंग’’ शब्द चिढ़ाने या छेड़ने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। विशेष रूप से देर तक और तीव्रता से चिढ़ाने-छेड़ने के अर्थ में । ब्रिटिश अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग किसी को क्रूर मजाकों से सताने के अर्थ में होता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में निश्चित जानकारी नही है लेकिन यह शब्द सन् 1790 और 1800 के बीच ब्रिटेन में प्रचलन में आया। पुराने छात्रों द्वारा नए छात्रों की रैगिंग करने की परंपरा भी ब्रिटेन में सन् 1800 के बाद ही शुरू हुई थी। यद्यपि भारत में कलकत्ता का फोर्ट विलियम कालेज सन् 1800 में और मद्रास का सेंट जार्ज कालेज 1812 में स्थापित हुए, ये दोनों ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा स्थापित काॅलेज थे, लेकिन इन दोनों काॅलेज में रैगिंग का कोई इतिहास नही मिलता। वास्तव में रैगिंग मिलिट्री स्कूलों में होती है जहां से देश की रक्षा करने को तत्पर सैनिकों की उत्पत्ति होती है। मिलिट्री स्कूलों में रैगिंग का सीधा उद्देश्य जूनियर कैडिटों को सीनियरों कैडिटों के प्रति आज्ञाकारी और शारीरिक रूप से उन्हें सख्त बनाना होता है और यह रैगिंग की प्रक्रिया साधारण परिचय से खत्म न होकर ल...

साक्षात्कार श्री अवैद्यनाथ जी सन् 2007 गोरक्षपीठ गोरखनाथ मंदिर गोरखपुर

प्रारंभिक दिनों में मेरे पत्रकारिता जीवन के प्रथम संपादक जिनका मार्गदर्शन मेरे पत्रकार को उभारने की कंुजी बना स्वर्गीय श्री विजयशंकर बाजपेयी संपादक विचार मीमांसा जो भोपाल से प्रकाशित हुआ करती थी और सन् 1996 में सर्वाधिक चर्चित एवं विवादित पत्रिकाओं में से एक रही। आज उनकी स्मृतियां मेरे हृदय के कोष में एकदम सुरक्षित है, उनके साथ व्यतीत हुए शिक्षापूर्ण क्षणों को भूल जाना मेरे लिए पत्रकारिता से सन्यास लेने के समान है। ऐसे अमूल्य गुणी एवं ज्ञानी व्यक्ति के मार्गदर्शन में तथा विचार मीमांसा के उत्तर प्रदेश ब्यूरो की प्रमुख के रूप में गोरखपुर मेरा उत्तर प्रदेश का पहला सुपुर्द नियत कार्य था, जहां मुझे गोरक्षनाथपीठ पर पूरा प्रतिवेदन तो लिखना ही था साथ ही महन्त स्वर्गीय श्री अवैद्यनाथ जी और योगी आदित्यनाथ के साक्षात्कार भी करने थे। किन्ही दुखःद कारणों एवं परिस्थितियांवश जिनकी चर्चा कर मैं विचार मीमांसा की अदभुत स्मृतियों का अपमान नही करना चाहती, यह कहानी विचार में तो प्रकाशित न हो सकी किन्तु अन्य कुछ एक पत्रिकाओं में इस विवादग्रस्त विषय को स्थान मिला, और श्री अवैद्यनाथ जी के देहत्यागने के सम...

जोधाएं बचेंगी तब न...

अकबर को जोधा नही दोगे ठीक बात है किन्तु अपने लिए भी नही चुनोगे ये कहां का इंसाफ है, उलटा जहां तक संभव होगा जोधा को धरती पर आने ही नही दोगे। भईया! अकबर को जोधा देने न देने की स्थिति तो तब आएगी न जब जोधाएं बचेंगी। लड़कियां बची ही कहां हैं जो थोड़ी बहुत हैं उन्हें बचा सको तो बचा लो, क्यूंकि सामने लड़कों की कोई कमी नही है। यहां राम के लिए सीता, कृष्ण के लिए रुक्मिणी सत्यभामा नही मिल रहीं और वहां अकबर से जोधा को बचाने की बातें हो रही हैं। वहां एक-एक घर में दो-दो दर्जन अकबर मौजूद हैं यहां घरों में एक या दो सूरजमल या सूजा भाईसा तो हैं पर जोधा तो 5 में से एक ही घर में मिलेगी। अब दो पत्नियों वाले भगवान छोड़िए, एक भी पत्नि वाले भगवान नही दिखने वाले तिस पर पत्नी विहीन देवता महात्माओं का जल विसर्जन कर डाला जा रहा है। साईं बाबा के पीछे हाथ पैर धोकर पड़ गए हैं सब क्यूं भाई? ऐसा क्या हो गया? अगर वे भी पत्नी वाले होते तो संभवतः उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत न पड़ती। आखिर बीवी के रहते किसकी मजाल जो मियां को नाखून भी मार सके। लेकिन बीवियों के मामले में यह विपरीत है, वहां कोई ज़्यादा देर घूरता हो तो पति कहता ...

हम कुंवारे है ब्रम्हचारी नही

क्यूं कर रट लगाए रहते हो...शादी विवाह की ? अरे न हुई हमारी तो कौन सी दुनिया लुट गई तुम्हारी। हम सबने नही की शादी इसी लिए संभल गई देश की आबादी वरना खाली बिठा देते ऐसे दिमागों को तो सिवाय बच्चे पैदा करने के और कोई काम न करते... कैसे करते देश सेवा जो घर की भाजी तरकारी में ही जीवन फंसा बैठते, कैसे लिखते काव्यग्रंथ कैसे गाते गीत सुहाने जो कपड़े बरतन में ही बिताते । हममें वो दम नही जो घर गृहस्थी के चक्र के साथ जीवन का सुदर्शन चक्र भी घुमाते। ऐसा नही कि हमें कभी कोई मिले नही पर नसीब ऐसे हमारे कि वो सब आए जीवन में पर टिके नही... हमने तो कहा ही था कि हम कुंवारे है ब्रम्हचारी नही दो ने नर ढूंढने का कष्ट नही उठाया और दो के भाग्य में हो कर भी नारी नही

मै भी तो देखूं ज़रा...

धर्मगुरु शंकराचार्य की बात से शत-प्रतिशत सहमत हूं, सबको इच्छानुसार सम्पूर्ण गृहस्थ जीवन का लाभ मिलना ही चाहिए निःसंतान पुरुष दूसरी पत्नी अवश्य लेकर आएं। इसके पूर्व डाॅक्टरी जांच अवश्य करवा लें। कहीं ऐसा तो नही कि भोजन ही बेस्वाद बना हो और हम बर्तन बदल-बदल कर उसका स्वाद अच्छा हो जाने की उम्मीद लगाए बैठे रहे। कमी पुरुष में न हो तो यह संभव है कि दूसरी शादी हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने में कारगर हो, परन्तु ऐसी स्थिति में क्या करिएगा जहां पुरुष ही नपुंसक हो ऐसे में तो पत्नी को भी दूसरा पति रखने का अधिकार होना ही चाहिए। वरन् ऐसी किसी भी परिस्थिति में जहां स्त्री को अपने पति से सुख की प्राप्ति न हो चाहे संतान, आर्थिक, मानसिक किसी भी प्रकार का सुख तो ऐसे में पत्नी दूसरा पति रख सकती है। मतलब तो हिन्दूओं को संतानोत्पत्ति से है और यह कार्य तो स्त्री को ही करना है़, बस एक छोटी सी डाॅक्टरी जांच और किसे पति या पत्नी लेकर आना है यह तय हो जाएगा। वैसे बात तो सही है जनसंख्या नियंत्रण का विषय वास्तव में केवल हिन्दुओं पर लागू करके काबुल, कंधार की तरह भारत को भी हिन्दू विहीन बनाने का क्या फायदा? तो जागरुक हिन...