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...क्यूंकि उसको मुझसे प्यार है

अभी कल ही तो मिला था, फिर पता नही कहां गया? मुझे समझ नही आता जब उन्हे इतनी जल्दी होती है तो वो आते ही क्यूं हैं! बेकार का ताम झाम, तैयारी बैठकी, लो वो आया और ये लो जैसे ही बैठने चले वो चल दिए। गुस्सा तो कई बार आता है लेकिन उस पर बिगड़ कर आगे मिलने का मौका मैं खोना नही चाहती। उसके बिना तो सारे काम ही रूक जाते हैं मेरे...दूसरों के पास भी जाना आना है उसका, पर मुझे बुरा नही लगता हां कभी कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि वो पहले और ज़रा देर तक सिर्फ मेरे पास ही ठहरे। पहले बहुत कम आता था वो, शायद मैं उसको अहमियत कम देती थी तो वो देर तक मुझे सताता रहता था, सुकून से एक मन से कोई काम करने ही नही देता। अब इंतज़ार करती हूं तो साहब भाव ही नही देता। ये सब तो पुरानी रीत है, जबतक पीछे भागो कोई पूछता नही और मुंह फेर लो तो पीछा होने लगता है। उस दिन देर तक उसकी राह देखती रही, घण्टों आंखें खोले छत की ओर ताकते हुए वक़्त बीता, फिर बेवजह टेलीविज़न खुला रहा, मैं बैठी रही कुछ भी नही देखा, थोड़ी नमकीन चबाई, थोड़ी चाय भी पी ली, काली चाय हल्की मीठी चुस्की ले लेकर उसके आने की आहट सुनने का प्रयास करती रही। अचानक सोचा दूसर...

Imagined of life, dreamed about Kolkata

Whenever I imagined of nature surrounded with concrete I saw Kolkata in my dream, whenever I imagined culture heritage surrounded with fashion and glamour I dreamed of Kolkata, whenever I imagined of art and music surrounded with pollution and market I felt brave with Kolkata...last but not the least whenever I imagined of real taste good mouth watering food surrounded with loads of hungry population and undeveloped areas I started weeping in my dreams only for Kolkata! Still a source of imagination and power of creation in the climate and whole atmosphere. Only Kolkata can say that "All the beautiful things are hiding inside me whoever looks for it can get it here only."

तुम बहुत अच्छा गाते थे

सिर्फ महसूस होता है कि ज़िन्दगी आगे बढ़ रही है, लेकिन जहां से दौड़ लगाई थी वहां की ज़मीन भले ही फिसल रही हो पर हम!, जहां थे वहीं खड़े हैं। सिर्फ आभास होता है कि हमने बदलाव देखे, ऐसे बदलाव तो बंद पिंजरे का जीव भी देख रहा होता है, जिसकी नीयति कैद में रहना मात्र से अधिक नही होती, इस शरीर में कै़द आत्मा की दशा भी उस जीव से कुछ अधिक भली नही। कुछ चीज़ों को होने से मैं कभी नही रोक सकी, जैसे बीते समय को बार बार याद दिलाने वाले लोगों का लगातार जीवन में आते जाते रहना, मैं चाहूं न चाहूं वे बीते समय को को मेरे जेहन से खोद निकालने का काम करते ही रहते हैं। अपनों के ऐसा करने से आत्मा की पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है, किन्तु कुछ चेहरे जिनसे कभी आत्मीयता नही रही उनके न रहने पर आंखें क्यूं छलछला जाती हैं, ये समझ ही नही आ रहा... तबले की थाप से ताल निकलते सुना था, उनकी तबले की थाप से सुर भी बहेंगे ये आने वाले समय ने बता दिया। व्यवसायिक कार्यक्रम करना बंद करने के तकरीबन 3 साल बाद दुर्गा पूजा का कार्यक्रम देखने आर.डी.एस.ओ जाना हुआ। महानवमी के अवसर पर गज़ल संध्या का आयोजन किया गया था, एकदम ताज़ादम नई आवाज़ अ...

आप लोग जहां भी हों मेरा प्रणाम स्वीकारें!

सिटी मांटेसरी स्कूल इन्दिरानगर ब्रान्च में नर्सरी का मुझे कुछ याद नही, केजी का भी कुछ खास नही बस अपना हरे रंग का होलडाॅल का बस्ता, नीली प्रिंस कम्पनी वाली वाॅटर बाॅटल, गुलाबी पेन्सिल बाॅक्स और गुलाबी मैगी के स्टीकर वाला टिफिन याद है, लेकिन अपनी पहली कक्षा की क्लास टीचर ‘‘शिप्रा लखनपाल’’ का चेहरा आज भी आंखों से नही उतरता, मासूम, गालों पर पिंपलस, माथे पर और चेहरे पर गिरते बाल, खूब गोरी और हमेशा हल्के रंग के खासतौर पर गुलाबी, हाथों में अधिकतर काॅपी की गड्डी थामे घूमती रहतीं थीं, उस समय जब सुबह पापा मुझे स्कूल के गेट पे छोड़कर जाते तो आंखें बस शिप्रा मैम को खोजतीं कि कब वो आएं कब मैं उनसे चिपक के बोलूं गुड माॅर्निंग मैम, और भी टीचर्स थीं रश्मि मैम, काॅल मैम और मेरी प्रिंसिपल...जीन मैक्फरलैण्ड एंग्लो इण्डियन थीं, गुलाबी त्वचा, बाॅब कट बाल उसपे हल्का मेकअप और अविश्वसनीय रूप से करीने से बंधी सारी जिससे पूरा शरीर ढंका रहता था। लेकिन उस उम्र में स्कूल जाने का मुख्य कारण शिप्रा मिस होती थीं, मुझे नही पता कि उनके साथ मुझे इतना मज़ा क्यूं आता था, दिन भर की पढ़ाई खेल पेन्टिंग खाना हर समय वो ही दिखती ...

कथा

नैना जब पैदा हुई, कोई उसे देखना नही चाहता था। गांव में माता का प्रकोप हो गया, हर कोई बीमार...नैना अपने साथ ये बीमारी लेकर आई है, ऐसा स्थानीय पुजारी का कहना था क्यूंकि नैना के नयनों का रंग हल्का था, मादक रंग। नैना को मंदिर सेवा में दान किया जाए तो गांव पर से महामारी का प्रकोप संभवतः कुछ कम हो जाएगा, पिता फौरन मान गए उन्हें तो वैसे भी कन्या अस्वीकार थी परन्तु मां...ने थोड़ा ज़्यादा समय लिया फिर मां...भी मान गई। नैना को पांच वर्ष की आयु में मंदिर मठ को दान दिया जाने का संकल्प लिया गया, जिससे गांव की समस्या भी स्वास्थ्य विभाग के अथक प्रयास से दूर हो गई और नैना के पिता के अथक प्रयास से नैना का छोटा भाई भी दुनिया में आ गया। घर की ड्योढ़ी पर कुत्ता भी आकर पड़ा रहे तो कुछ समय बाद उसकी भी चिन्ता होने लगती है और फिर नैना तो जीवित हंसती बोलती बच्ची थी। जैसे जैसे 3 साल की होने को आई उसके पिता का न जाने कैसे उससे प्रेम बढ़ने लगा...वो जो भी मांगती पिता ला देते और मां का कलेजा मुंह को आता जाता था। बेटा तो पा गया था छोटेलाल फिर क्यूं इस अभागी पर मोह बढ़ रहा था उसका जो और दो साल बाद अंजान हाथों विदा हो...

लखनऊ खामोश ही रहता है

वक़्त बेवक़्त बड़ी सी जम्हाई लेना मुझे बेहद पसंद है और सुबह शाम की एक प्याली चाय हल्की मीठी तेज़ पत्ती की अगर 4-5 बजे के दौरान मिल जाए तो चुस्की से चूकने का सवाल ही नही, बिना वजह किसी के साथ बैठकर पुरानी बीती बातों पे बहस करना तो अव्वल किस्म का शौक़ मानती हूं। कितना भी खाने पीने पर काबू रखने की सोचूं, चौक़ पास से गुज़रने पर नाक सारे बंधन तोड़कर पेट को इशारे करने लगता है कि फौरन ज़बान को खबर कर दे कि श्री की लस्सी, छोले भटूरे, अवध बिरियानी कॉर्नर, या कवाब परांठे की दुकान दांयी तरफ ही है। अब ऐसे में किसे परवाह है कि साहब दिल्ली वाली जीन्स और मुम्बई वाली टी-शर्ट टाईट हो गया तो क्या पहनेंगे? अरे चिकन के ढीले कुर्ते और सलवार पहन लेंगे, उसमें भी कम रौब नही पड़ता! मुझे अकसर लखनऊ छोड़कर बड़े शहरों में जा बसे बेचारे दोस्तों की बातों को सुनना पड़ता है, बेचारे अपनी मिटटी से दूर होकर इसक़दर टूट गए हैं कि उनका हाल, ‘‘लोमड़ी के खटटे अंगूरों’’ की कहानी सा हो चला है। जब यहां रहने की खुशनसीबी ज़िन्दगी की ज़रूरतों में उलझकर बड़े शहरों के पहिये में पिस कर रह गया तो भलाई इसी में कि जो मिला उसे ही ...

बिना मोदी के कांग्रेस को नही आराम

बिना मोदी के कांग्रेस को नही आराम अख़बार में पप्पू का नया संवाद पढ़ा, मोदी सरकार मुझसे बदला ले किसानों से नही! मोदी सरकार किसानों से कौन सा बदला ले रही है? ये पूछने पर शहज़ादा ए कांग्रेस थोड़ी देर सोच में पड़कर मौन हो जाते हैं क्यूंकि वो भूमि अधिग्रहण शब्द अकसर भूल जाते हैं कि कैसे बोला जाए? किसानों को पेंशन, 2 लाख का बीमा, और मौसम की मार से खराब उपज को भी खरीद लेने की बात राहुल ने अभी पढ़ी नही क्यूंकि उनके यहां संभवतः हिन्दी अख़बार भी नही आते, आए भी क्यूं हिन्दी तो हिन्दुस्तान की भाषा है और स्वदेशी वस्तुओं से राहुल गांधी का क्या लेना देना? आज़ादी के तुरन्त बाद बंटवारे के रिसते ज़ख़्म अभी सूखे भी नही थे और देश की माली हालत ख़स्ता थी, उस समय भी इसके घर से कोट-सूट लगातार धुलने के लिए विमान द्वारा पेरिस जाते थे और पीने के लिए तो आज भी दिल्ली तक श्रीनगर के चश्मे शाही से ही पानी आता ही है। एक साल में हार का ज़ख़्म धोने के लिए इस शाही खच्चर को पूरी दुनिया में थाईलैण्ड ही मिला, क्या चिन्तन मनन और आध्यात्म के लिए हमारे देश में जगह कम पड़ गई थी इस विदेशी को, बेशर्मी की इंतहा देखिए...नेपाल के इतने बड़े व...