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बंदूक अपने कंधों पर रख कर चलाना सीखिए...दूसरे के नही!

सही कहा मेरे एक फेसबुकिए मित्र ने कि ज़रूरत से ज़्यादा बेवकूफ और ज़रूरत से ज़्यादा समझदार लोगों में एक ही बुराई होती है, दोंनो ही किसी की नही सुनते। इधर खुद पर भी काफी हंसी आई जब लगातार एक मूर्ख को मैं धारा 370 के एक आलेख पर जवाब देती रही, मुझे एहसास हुआ कि मैं भी वही कर रही हूं जो ये मूर्ख कर रही है। उसने ध्यान से मेरे आलेख को पढ़ा ही नही था, उसे अपना सीमित ज्ञान हम सब तक पहुंचाना था और शायद इतना लिखना उसके बस में नही था तो उसने मुझे ही सीढ़ी बनाने की सोच ली। अचानक से आया किताबी और अधूरा ज्ञान कितना घातक होता है ये देख कर हंसी से ज़्यादा दहशत हुई, ऐसे ही अधूरे ज्ञान के साथ भारत की युवा पीढ़ी का भविष्य कहां जा रहा है??? इनकी भाषा और विरोध ने जाने अंजाने इन्हें देश के विरूद्ध कर दिया है, उम्र और युवावस्था की तेज़ी में भ्रष्ट बुद्धि के कुछ लोग आपको बिना समझे ही शिक्षा देने लगें तो एक बारगी तनिक कष्ट तो होता है फिर इन्हीं लोगों की बुद्धि और समझ पर दया भी आती है। उस बेचारी को जाने देते हैं क्यूंकि वो एक आधी अधूरी जानकारी और अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार युवा थी, थोड़ा ऊपर उठ कर बात करते हैं क...

वास्तव में 370 में सांस कांग्रेस की अटकी थी कश्मीर की नही

बस अब थोड़ा सावधान रहने की आवश्यक्ता है और कुछ नही, कारण भले ही कुछ लोगों ने अपने बच्चों के नाम रावण रख दिए हों परन्तु विभीषण नाम आज तक किसी मां-बाप ने अपने बच्चे के लिए नही चुना। ऐसे ही राज्यसभा के उन 61 वोटों को याद रखना होगा जो देश के विरूद्ध डाले गए। हमारे ही बीच ऐसे कौन लोग हैं जो देश को सम्पूर्ण रूप में नही देखना चाहते, और ऐसा है भी तो क्यूं? देश के टुकड़े होने से उन्हें क्या और कैसा लाभ मिल रहा है यदि केवल इस पर विचार करिएगा तो भी आपको उन देशद्रोहियों के नाम बगैर खोजे मिल जाएंगे। लगातार 70 वर्षों तक देश को आधा अधूरा बनाकर रखने के बाद आज देश को पूरा देखकर जिन्हें खुशी नही हो रही वो देश के सगे तो नही हो सकते अलबत्ता उन्हें अपने वोट बैंक में ज़रूर कुछ कमी महसूस हो रही होगी और सत्ता लोलुप जन्तुओं के लिए वोट का नुकसान सभी नुकसानों से बड़ा है, अन्यथा ये तथ्य वास्तव में सोच का विषय है कि केवल जम्मू कश्मीर के नेताओं के बच्चे ही वहां के स्थानीय स्कूलों में नही जाते सभी विदेशी स्कूलों में पढ़कर आए हैं या अभी भी पढ़ रहे हैं। कश्मीर की ग़रीबी वहां के आस पास के इलाकों का पिछड़ापन साफ नज़र आता ...

इस बार पकड़ में आया है तो जाने मत देना

आज़म खान को समझना और समझाना दोनों ही बेहद ज़रूरी है, वरना इसकी जीभ फिसलते हुए किस किस को चाट कर घायल करती जाएगी इसका अभी आपको अंदाज़ा नही है। हांलाकि हमें देष के काम के लिए एक ऐसे ही तेज़ाबी जीभ वाले की ज़रूरत थी जो पाकिस्तान जाकर भारत की तरफ से बात-चीत कर सके, लेकिन क्या कहें कि ये कमबख़्त गद्दार निकला जो खुद ही पाकिस्तान जाकर रहना चाहता है। वो तो कब्ज़ा किए हुए ज़मीनों का मोह है जो छूट नही रहा वरना कब का चला गया होता। उन ज़मीनों को बेचे भी तो किसे ? आजकल कुछ भी छुपा हुआ और गोपनीय नही रहता, ऐसे में ज़मीन का सौदा चुपचाप हो ये कैसे संभव है? फिलहाल वक़्त काटने और मुफ्त की शोहरत पाने का सबसे बेहतरीन तरीका जो आज़म जानते हैं वो सिर्फ औरतों के अलावा और कुछ नही हो सकता। किसी औरत की किस तरह बेइज़्ज़ती की जाती है ये कोई इनसे सीखे, एकदम सटीक और अचूक तंज कसने छिछोरी शेरो-षायरी वगैरह आज़म के पुराने अस्त्र रहे हैं। ऐसे में जया प्रदा हों या फिर भाजपा सांसद रमा देवी या फिर कल को कोई और स्त्री कोई फर्क नही पड़ेगा, आज़म ढीठ थे और रहेंगे। अपने बुरे बीते बचपन की यादों का विषाद और कुण्ठा लेकर एक ड्रामेबाज़ की तरह ज़िन...

हिन्दू होने के नाते इतना तो कीजिए...

बाबर से लेकर औरंगज़ेब तक की देश की गुलामी जिसे इतिहास में छुपा दिया गया, अंग्रेज़ों द्वारा किए गए कार्यों को देशहित से जोड़कर पढ़ाना और हर वास्तविक जानकारी को घुमा फिरा कर परोसने के लिए इन इतिहासकारों को क्या प्रस्ताव दिया गया होगा इस बारे में कुछ कह पाना कठिन है क्यूंकि देश के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने की सज़ा देशद्रोह से कम नही हो सकती और देशद्रोह की एकमात्र सज़ा मृत्युदण्ड ही होना चाहिए, किन्तु ये इतिहासकार अपने अपने हिस्से की शान और आराम की ज़िन्दगी जी कर कहीं मिट्टी में दफ्न हो गए तो कहीं जलाकर इनकी अस्थियों का विसर्जन कर दिया गया, और मरणोंपरान्त इनके रचे गए झूठ अमर हो गए कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी विदेशी आक्रमणकारियों को ही अपना उद्धारक और देश का भूत, भविष्य और वर्तमान मान ले। क्या आपको या आपके बच्चों को पता है कि लालकिले के ठीक सामने शिवालय का निर्माण करवा कर बाज़ीराव पेशवा ने हिन्दुओं के गौरवशाली इतिकास को और भी महान बना दिया। औरंगजे़ब में साहस नही था कि वो किले से बाहर आकर बाजीराव को रोक सकता या चुनौती दे सकता, किन्तु आम जनता को औरंगज़ेब की औकात पता चल चुकी थी। देशभक्ती और बलिदा...

क्यूंकि नज़र होती ही है बदलने के लिए...

गृहयुद्ध की ओर बढ़ते इन कदमों को किसी न किसी उपाय से रोकना ही होगा, देश का प्रधान सेवक भी मौके की गंभीरता से अनभिज्ञ नही है किन्तु कोई तो कारण होगा ही कि फिलहाल चुप है। दाउद इब्राहीम की नई तस्वीर का मिलना और ज़किर नाईक का पकड़ा जाना कहीं न कहीं चुप रहने के पीछे कोई नई कहानी बुन रहा है। कैसी कहानी...? तेल की मजबूरी, तो कहीं न कहीं पाकिस्तान के साथ नर्मी बरतने की बात पर समझौता या फिर कुछ और ही चल रहा है उस दिमाग के भीतर? वोट देकर अफसोस करने वालों को कल एक बार फिर अपने अफसोस पर भी अफसोस होगा। युद्ध के नियमों से अपरिचित लोग भी अभी नही जानते कि युद्ध का हर नियम जायज़ ठहराने के पीछे भी कई राज़ छुपे थे। आप सीधा हमला भी करते थे, भूखा रख कर फिर भोजन का लालच दिखा कर काबू कर लेते थे, आप कभी यूं भी करते थे कि जो सहूलियत आपको आपका शासक नही दे सका उन्हीं चीज़ों को देने का वायदा करके भी आप किलों के बन्द दरवाज़े खुलवा कर जीत हासिल कर लेते थे। हर हाल में जनता ही होती थी जो सामने वाले का शिकार बनती थी, कभी हिन्दू मुग़लों का और कभी मुग़ल हिन्दुओं का! ऐसे ही किसी अदृश्य युद्ध का हम और आप शिकार बने हुए हैं, समय ...

जिसका काम उसी को साजे

फिल्मी कलाकारों का बेरोज़गारी और फिल्म की असफलताओं के दौरान समय व्यतीत करने या सस्ती लोकप्रियता की चाह ने फिल्म को जाने अंजाने राजनीति से जोड़कर देखना आरंभ कर दिया , सारी गंदगी की शुरूआत यहीं से हुई। देखते देखते अचानक 1995-96 में ऐसा दौर आया कि संपूर्ण कला जगत पर राजनीति तेज़ी से हावी होने लगी , और आज ये हाल है कि हर किस्म के छोटे बड़े भूले बिसरे और अपने खत्म होते करियर को सीधा जनमंच पर चमकाने के लिए हर क्षेत्र हर कला से जुड़ा कलाकार और व्यवसायी राजनीति का हिस् सा बन जाता है। दो नावों पर पैर रखने का नतीजा कांग्रेस के समय में लोग अमिताभ बच्चन और भाजपा के समय में विनोद खन्ना की शक्ल में देख चुके हैं , या तो आप देश सेवा करें या आत्म सेवा , या व्यवसाय करें या राजनीति या तो आप कुशल कलाकार है या फिर कुटिल राजनीतिज्ञ आप दोनों नही हो सकते , कभी नही। अगर आप की जीभ अचानक देश और धर्म के प्रति ज़हर उगलने लगी है तो आपको राजनीति की छूत लग चुकी है और अब आप कलाकार की श्रेणी से बाहर हैं , केवल अपनी बात को रखने के नाम पर जो स्वतंत्रता हमारे भारत का संविधान देता है उसका दुरपयोग करना यदि आप सीख गए हैं तो ...

उन्हें पसंद है फटे में टांग डालना

वो जो कल तक साथ थे आज खिलाफ हो गए , जिन्हें राजनीति का ' र ' नही आता वो देश चलाने के तरीके पर राय बरसा रहे हैं। जो भाजपा को देश तोड़ने की राजनीति करने वाली पार्टी कह रहे थे वे आज मुसलमानों के उद्धार और उत्थान की बात पर तड़प रहे हैं। अभी तो सिर्फ सबका विश्वास जीतने की बात हुई और अभी से ही सबके साथ विश्वासघात भी हो गया। तकलीफ तब होनी चाहिए जब अपने घर से छीन कर किसी दूसरे को मिल रहा हो , यहां तो सिर्फ उन्हें वो दिया जा रहा है जिसे वो कभी पा ही नही सके और दूसरों को भी नही दिया गया ये कह कर कि ये किसी की अमानत है और इसी डायलॉग के साथ 70 वर्ष तक सिर्फ विश्वास और विश्वासघात का खेल होता रहा , कभी अपने साथ कभी उनके साथ , दोनों के हिस्से की रोटी छोटी होती गई पर कांग्रेस का तराजू कभी बराबर न हो सका। बराबर होता भी तो कैसे ? देश की उन्नित के नाम पर बार बार , हर एक भारतीय के अधिकार से टुकड़े काट काट कर वो अपना पार्टी फण्ड भरते रहे जिससे चुनावों के खर्चे भी जनता की ही जेब से पूरे हो जाएं और जो बचे वो स्विस खातों की शोभा बढ़ाएं। असल में जनता स्वयं ही नही जानती कि उसे शिकायत करनी किस...