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मोदी ही समझे नारी को...

नारी शक्ति को प्रणाम करने वाले बिन नारी के नर मोदी जी के क्लीन स्वीप वाली चाल पर उनको और मर्दानी किरण बेदी को बधाईयां, मोदी की सफलता का एकमात्र मूलमंत्र कि वे नारी को समझ गए जो नारी को बनाने वाला विधाता भी नही समझ सका। केजरी मुक्त दिल्ली के अभियान को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए पूरे दल बल सहित हल्ला बोल वाली मुद्रा में दिख रहे मोदी आजकल बड़े उग्र मूड में हैं, और हों भी क्यूं न उग्रवादियों का सफाया करने के लिए उन्हें ऐसा ही रवैया अपनाना होगा, परन्तु एक बार सोच कर देखिए अगर भाजपा हार गई तो किरण बेदी का भाजपा जैसी पार्टी में कैसा भविष्य होगा? भाजपा में स्त्री शक्ति का किसी न किसी पद पर आसीन होना अति आवश्यक है, यदि ये औरतें खाली बैठीं तो भाजपा को भी अनशन पर बैठना होगा...आप नाराज़ मत होईए अभी इसका कारण भी बताए देती हूं, देखिए औरतों में एक ख़ासियत जन्मजात होती है कि किसी भी क़ीमत किसी भी हाल में गुस्से प्यार या ज़िद से अपनी बात मनवाकर ही बैकुण्ठ धाम का रास्ता देखती हैं, इतना आप माने न माने परन्तु मन नही मन सब इस सच से रूबरू हो चुके हैं, विशेषकर विवाहित पुरूष...नारी के कारण रामायण, उस...

कहीं नही वो नाम तुम्हारा

कुछ पन्ने खोले हैं आज पुराने सब बेग़ाने से लगते हैं कोई कोई पहचाने लिखे हैं उन पर किस्से कहानी और फ़साने हर काग़ज़ के कोने पर एक छींट लगी है ग़ौर से देखा तो इक टुकड़ा नाम का था तब भी पूरा नाम नहीं लेती थी तुम्हारा चाहा कि अब आज अभी लिख दूं फिर से पर क़लम चली काग़ज़ के कोने पर न दोबारा अब छींट भर भी नही रहा वो नाम कहीं पर न ज़ुबान न दिल न काग़ज़ कहीं नही वो नाम तुम्हारा

उन्हें ये जिद कि मुझे देखकर किसी को न देख...मेरा ये शौक कि सबसे कलाम करता चलूं

आप का कष्ट आपका ही रह गया, कोई दर्द बांटने भी नही आता अब, उल्टे वो हैं कि बेरहमी से चेहरा फेर कर चल दिए। एक मोदी एक शाह बाकी सब बिन टोपी बिन राह... गुजरात में तो बस धोती ही खींची गई थी यहां तो मफलर उतना भी नही छुपा पाएगा। कुमार विश्वास का ज़ख़्म भरने के बजाए दर्द के मारे ऐसा रिसा कि नासूर बनकर कविता की पंक्तियों की स्याही बन बैठा, और आधुनिक कवियों का हाल देखिए ! इको फ्रेन्डली कवि हैं, कागज़ नही बरबाद करते वरन 2-4 लाईनों की प्रेरणा मिलते ही ट्वीट कर देते हैं जिससे बाकी की कविता हम स्वयं ही पूरी कर लें और जो समझ आए समझ लें। किरण बेदी की बेरूख़ी की वजह क्या हो सकती है, बैठ कर आपको ही सोचना होगा, सारी ज़िन्दगी तिहाड़ छाप कैदियों से उकता कर वो संभवतः एक बार फिर वहीं के लोगों में दोबारा न बैठना चाहती हों। आखि़र कहीं तो धरने से फुरसत मिलनी ही चाहिए। वैसे गुजरातियों को पतंग उड़ाना वास्तव में बहुत ज़्यादा पसंद है और कटी पतंगों को लूटना उससे ज़्यादा पसंद है ये तो उन्होंने साबित कर दिया। महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल छीन लिए कांग्रेस से, यहां झाड़ू और बेदी के बार शाज़िया भी जा रही है। आखि़र कोई क...

जो जीवन जीना सिखाए वही गीता है

स्कूलों में गीता अध्ययन आरंभ किए जाने पर विवाद जारी है, इसके असंख्य कारणों में से प्रथम पूर्वाग्रह से ग्रस्त कायर लोगों का दल जिन्हें लगता है कि गीता किसी विशेष वर्ग अथवा जाति हेतु है, इसके अलावा कुछ वो लोग जो हिन्दुत्व और हिन्दुवाद के ढोंग करते हैं परन्तु गीता को कभी हाथों में उठाने का भी कष्ट नही किया होगा, पढ़ना तो दूर की बात है। यदि वास्तव में गीता को अध्ययन पाठ्यक्रम में लाया गया तो यह बच्चों को स्कूली पढ़ाई से कहीं अधिक सशक्त ज्ञान प्रदान कर ेगा, भले ही इसे किसी भी भाषा में अनुवाद कर पढ़ाया जाए। जीवन जीने के सिद्धान्तों का परिचय है गीता, ईश्वर को समझ पाने का सरल उपाय है गीता, जिजीविषा ही ईश्वर है अर्थात जीवन को जीने की इच्छाशक्ति ही ईश्वर है, काम क्रोध पर नियंत्रण का एकमात्र ज़रिया है गीता, मनुष्य को यह समझाने कि वह स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी, यह भी कि किस प्रकार वह मृत्यूलोक में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, हम जीवन भर केवल सुख खोजने के लिए गीता पढ़ते हैं और यह भूल जाते है कि गीता को कहने वाले महागुरु महाराज कृष्ण को जीवन ...

जो दिखता नही वो होता भी नही क्या?

मैंने ईश्वर को नही देखा, मैंने भूत नही देखे, हवा नही देखी और तो और घण्टों योग-ध्यान के पश्चात् भी मुझे अपनी आत्मा के दर्शन नही हुए, दूसरे तो छोड़िए मैंने तो अपनी पृथ्वी को भी नही देखा कि वो गोल है या चैकोर? परन्तु मुझे विश्वास है कि ये सब हैं ही क्यूंकि बाकी लोग बड़े दावे के साथ ऐसी ही कहते हैं। मतलब वे अप्रत्यक्ष रूप से इस बात को भी स्वीकार कर रहे हैं कि यदि कोई वस्तु व्यक्ति या घटना आंखों देखी न हो तो इसका मतलब ये नही कि वो है नही या घटित नही हुई। गुस्सा दिखे नही तो अंदाज़ा न लगाईए कि है नही, खुशी दिखे नही तो भी मत सोच लीजिए कि है नही, दुःख, द्वेष, स्वार्थ और प्रेम का भी यही हाल है, भावनाएं दिखती नही पर होती हैं। इसके ठीक उलट भावुकता स्पष्ट दिखती है जबकि वास्तविकता में वो होती ही नही जो होती तो स्थिर होती, स्वार्थ दिखता नही पर होता है क्यूंकि स्वार्थ ही सहसा भावनाओं और भावुकता दोनों को खा जाता है। झूठ होता नही पर लोग मान लेते हैं, सत्य होता है पर लोग मानते नही। सीधी सी बात है कि उसकी बनाई दुनिया में जो है उसे अकसर हम समझते हैं कि नही है और जो नही है उसे कहते हैं कि है... अब इसमें...

फिल्म को हाॅल के भीतर छोड़ आईए

एक कोई बात किसी भी कम्बल या रज़ाई से ज़्यादा गर्म होती है इतना तो मानेंगे न आप ? उदाहरण के लिए किसी भी मुद्दे की गर्मी देखिए ज़रा...हर हाथ उसे सेंकने को तैयार हो जाता है। जो मुद्दे का हिस्सा हैं उनके शरीर के हर हिस्से से पसीना टपक रहा होता है, और पारा है जो 2 डिग्री के नीचे गिरता जाता है। विवाद अदरक की चाय से ज़्यादा असरदार होता है जो हर ज़बान को गर्म रखता है और दिमाग को उबाल पर रखता है, भले ही बहस करने वालों के दिल बर्फ से ज़्यादा ठण्डे हों। किसी भी विषय को एक क्षण में राष्ट्री य स्तर पर उछालना और दो कौड़ी के लोगों को सस्ता प्रचार दिलाने की बेवकूफी करने वालों को अब क्या कहा जाए। किसी भी फिल्म की औकात उस फिल्म के एक शो के टिकट से ज़्यादा नही होनी चाहिए, आपने फिल्म देखी हाॅल से निकले और टिकट को कूड़ेदान के हवाले कर दिया न कि बाकी की सारी ज़िन्दगी उसी फिल्म के ऊपर ही बिताने की शपथ खा ली। जब हम फिल्मों पर जीवन नही बिताते तो उसे ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देने वाले काम क्यूं करने लगते हैं। हम भूल जाते हैं फिल्में सिर्फ टाईम पास का ज़रिया होती हैं, उनसे हमारी कोई भी ज़रूरत पूरी नही होती। अगर ज़रूर...

रैगिंगःस्वागत समारोह या मौत से परिचय

अमरीकन अंग्रेजी में ‘‘रैगिंग’’ शब्द चिढ़ाने या छेड़ने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। विशेष रूप से देर तक और तीव्रता से चिढ़ाने-छेड़ने के अर्थ में । ब्रिटिश अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग किसी को क्रूर मजाकों से सताने के अर्थ में होता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में निश्चित जानकारी नही है लेकिन यह शब्द सन् 1790 और 1800 के बीच ब्रिटेन में प्रचलन में आया। पुराने छात्रों द्वारा नए छात्रों की रैगिंग करने की परंपरा भी ब्रिटेन में सन् 1800 के बाद ही शुरू हुई थी। यद्यपि भारत में कलकत्ता का फोर्ट विलियम कालेज सन् 1800 में और मद्रास का सेंट जार्ज कालेज 1812 में स्थापित हुए, ये दोनों ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा स्थापित काॅलेज थे, लेकिन इन दोनों काॅलेज में रैगिंग का कोई इतिहास नही मिलता। वास्तव में रैगिंग मिलिट्री स्कूलों में होती है जहां से देश की रक्षा करने को तत्पर सैनिकों की उत्पत्ति होती है। मिलिट्री स्कूलों में रैगिंग का सीधा उद्देश्य जूनियर कैडिटों को सीनियरों कैडिटों के प्रति आज्ञाकारी और शारीरिक रूप से उन्हें सख्त बनाना होता है और यह रैगिंग की प्रक्रिया साधारण परिचय से खत्म न होकर ल...