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क्यूंकि निन्दा करने में मज़ा तो आपको भी आता ही है...

जब आपका कोई शत्रु न हो अथवा आप किसी का विरोध न कर रहे हों अथवा जबरन किसी के खिलाफ होकर उसका अपमान करने की योजना न बना रहे हों तो अचानक से लिखने के विषय ख़त्म होने लगते हैं। फिर जान समझ कर किसी न किसी के लिए मन में क्रोध जगाना पड़ता है, फिर वो क्रोध राजनीति से जुड़ा हो, फिल्म जगत से, खेल जगत से अथवा किसी भी क्षेत्र के व्यक्ति पर हो बस क्रोध आना भर चाहिए कि अचानक आपको निन्दा करने के नाम पर पचास पन्नों का मसाला मिल जाता है, जहां प्रशंसा के नाम पर आप एक शब्द नही खोज पा रहे थे। कभी सोचा आपने कि ऐसा क्यूं? सोचिएगा तो अपने कारण मुझसे बांटिएगा ज़रूर... अच्छा कहने, प्रशंसा करने लिखने में हमारी जीभ को काफी लचीला होना पड़ता है वहीं बुराई या निन्दा करने बोलने या लिखने में दिमाग को अधिक मशक्कत नही करनी पड़ती। अब आप इसे स्वीकार कीजिए या नही किन्तु सत्य तो कटु ही होता है, आपको इसका स्वाद भाए या न भाए। अब मेरे ही इस लेख को ले लीजिए इतनी देर से आपकी निन्दा किए जा रही हूं और आप इसे पढ़ कर मेरी हां में हां मिलाएंगे साथ ही टिप्पणियां भी करेंगे क्यूंकि आपको लगेगा यहां आपकी नही किसी और की बात हो रही है। अब स्वयं ...

क्या आपकी फटकार आपके बच्चे स्वीकार करेंगे???

क्या आपने कभी सोचा कि बच्चों के लिए कलम से इतना लिखना और लगातार पढ़ना हमसे अधिक सहज क्यूं होता है? हमारे लिए लिखना कभी कभी मुश्किल, कभी सिरदर्द तो कभी एकदम बोझ बन जाता है। एक उम्र के बाद हम सोच ज़्यादा सकते हैं और लिखना कम हो जाता है, यद्यपि हम ये भी आशा रखते हैं कि हमारी सोच समाज के सभी वर्गों अथवा वर्ग विशेष तक पहुंचे तथापि हम इसे पहुंचाने का सहज सरल माध्यम भी खोजना चाहते है किन्तु इतनी इच्छाओं के बाद भी कलम उठाकर कागज़ पर चलाना एक दुष्कर कार्य हो जाता है। यह एक उलझी मानसिकता, आलस, कामचोरी अथवा थकान भी हो सकती है लेकिन इसका प्रमुख कारण अधिकतर आत्मविश्वास की कमी ही कहलाती है। दरअसल हम जो सोचते हैं उस सोच को हम कोई स्तर नही दे पाते, इसका कारण स्पष्टरूप से यही है कि हम स्वयं का सम्मान नही करते। घर से निकलकर समाज में प्रवेश करने के बाद से आस पास के लोग जो भी राय हमारे या हमारे चरित्र के विषय में गढ़ते हैं हम उसी के अनुसार स्वयं को ढालने लगते हैं, हम भूल जाते हैं कि हमारे माता पिता ने हमें किस प्रकार पाल पोस कर बड़ा किया, कैसे संस्कार दिए अथवा वो हमारे बारे में क्या सोचते थे। हमें जब कोई राह ...

हाथ में आएगी वही पुरानी घड़ी

भावुक व्यक्ति और उसके विचार दोनों ही बेहद घातक होते हैं, यहां तक के भावुक व्यक्ति या भावुकता भरे विचार दोनों ही एक समान भयंकर परिणाम देने वाले होते हैं। क्षणिक प्रेम, लगाव या सहृदयता भी भावुकता की देन है। भावनाओं का सम्मान करना चाहिए किन्तु भावुकता का तिरस्कार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दोनों के बीच के आकाश पाताल समान अंतर को समझना चाहिए, जो समझ गए वो पार उतर गए और जो भंवर में उलझे डूब गए पर मरे नही वरन उन्हें भी खींच कर साथ ले गए जो उनके आस पास थे, वो कहावत तो है ही कि ‘‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी...’’ बहरहाल बसे बसाए घर कार्य और जीवन का सत्यानाश करने का 80 प्रतिशत श्रेय भावुकता को दे देना चाहिए। इससे आपको खु़द को क्षमा करने में विशेष सहायता मिलेगी और यही तो सबसे महत्वपूर्ण है कि हम सबसे पहले स्वयं को दोषी ठहराना बंद करें और सबसे पहले खुद को माफ करें। न किसी को दोष दें न स्वयं को दोषी मानें...किन्तु अगर इस भावुकता का उपयोग वोट डालते समय या देश कल्याण के कार्यों को लेकर की गई कोताही को नज़रअंदाज़ करते समय किया गया हो तो दोषी केवल और केवल आप ही होंगे, न तो वो वोटिंग मशीन दोषी ...

न स्वर्ग मिलेगा न ही नर्क!

एक बेहद रोमांचक और रहस्य भरा शब्द है इत्तेफाक, संयोग, दैवयोग, सन्निपतन, सम्पात अथवा अंग्रेज़ी में कोइंसीडेंस। वैसे तो आप सभी ज्ञानी गुणीजन हैं किन्तु फिर भी एक बात का आप सभी को पुर्नस्मरण कराना आवश्यक है कि इतिहास स्वयं को दोहराता है, फिर चाहे वह युद्ध हो, प्राकृतिक - अप्राकृतिक आपदा हो अथवा महामारी... ऐसा नही है कि करोना जैसी आपदा इस धरती पर पहली बार आई हो या मानवजाति ने आज से पहले कभी किसी प्रकार की वैश्विक महामारी का सामना न किया हो। फर्क़ केवल पीढ़ियों की सोच का है, सुविधाओं एवं वातावरण का है, हम तब भी लड़े थे जब पिछली बार ईश्वर का कोप हम पर बरसा और हम इतने ढीठ हैं कि फिर से लड़ कर जी रहे हैं और साथ ही ईश्वर को भी प्रसन्न करने के अनगिनत उपाय किए जा रहे हैं, किन्तु इस प्रकार के लेन देन से क्या सरल सहज ईश्वर मान जाएंगे??? हमें तो सौदा करने की लत है, कुछ ले दे के काम बन जाता तो... करोना तो ले दे के भी नहीं मानता, कम्यूनिस्ट रोग है सबको बराबरी की दृष्टि से देखता है। अपने मुहल्ले के बाबू नाई को जो रोग हुआ है वही देश के गृहमंत्री को भी हो गया। बहरहाल! आईए अब बात करते हैं संयोग की, संयोग यह क...

यहां केवल भूमिपूजन की बात हो रही है

भूमि पूजन कितना मनोरम शब्द, लगभग हर उस व्यक्ति के लिए जिसने अनगिनत अथक प्रयास और श्रम के पश्चात अपना खु़द का एक बसेरा बसाने की दिशा में सफलता का पहला कदम रखा हो। भीतपूजा, नींव की पहली ईंट और भी असंख्य शब्द हैं जिनका उपयोग इस शुभकार्य के पहले किया जाता है। जिस प्रकार विवाह के आयोजन से पूर्व अनगिनत असंतुष्टियां और विघ्न बाधाओं को पराजित करते हुए बेटी के पिता को अंततः कन्यादान करके सहस्त्रों पुण्यों को एक बार में फल प्राप्त हो जाता है वैसे ही  अपने और आने वाली सात पीढ़ियों के सिर पर छत देकर भूमि पूजने वाले पुरूष के भी दोनों लोक सफल हो जाते हैं। घर कितना बड़ा होगा इसका निर्णय प्रथमतः किया जाना कठिन होता है, क्यूंकि आरंभ में रहने वाले कभी दो तो कभी आठ हो सकते हैं किन्तु समय के साथ और ईश्वर की कृपा से हर आकार प्रकार के मकान में अनगिनत लोग समा जाते हैं, रहते हैं, जीवन बिताते हैं, फिर इसी प्रकार उनके बाद की पीढ़ी भी उसी में सहजता से समा जाती है। समस्या घर की छोटाई बड़ाई नही बल्कि समस्या जो सामने आती है वह यह कि भूमिपूजन में किस किस को और कितनों को बुलाएं? जिन्हें बुलाएंगे वो पूरी तरह शान्त और ...

हंसी खुशी भूल चुके...इसमें राजनीति का क्या दोष?

मनुष्य हंसना भूल गया है, हांलाकि इसका एहसास मुझे अतिरिक्त बुद्धि के श्राप से ग्रस्त एक व्यक्ति ने करवाया फिर भी उसको कोसना नही बनता। वास्तव में मुझे इस बात का प्रमाण मिला कि व्यक्ति खुश रहना ही नही चाहता, प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता की भी उसे कोई आवश्यक्ता नही क्यूंकि वह जानता ही नही कि वह चाहता क्या है? जिस ओर उसे अपनी मानसिकता का एक प्रतिशत भी प्रभाव दिखता है वह उसी ओर लुढक जाता है, मतलब मर नही जाता बस थाली के बैंगन सा लुढ़क जाता  है। हमारी समस्या यह है कि हम जानते भी नही और निर्णय भी नही कर सकते कि सही क्या है और ग़लत क्या? हम बस इतना जानते हैं कि जो हम मानते हैं बात वही है और अपनी सोच, दृष्टि एवं क्षमता के अनुसार प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने का वरदान तो ईश्वर ने बिन मांगे ही हमें दिया है। बिल्कुल किसी कैद में पल रहे जीव की तरह जो बंधन को ही जीवन मान लेता है। कोई बुरा होता ही नही केवल उसके कर्म बुरे होते हैं और लोग भी एक के बाद एक पीढ़ी दर पीढ़ी कांग्रेस को ही कोसते आए हैं, असल में बुराई कांग्रेस या कांग्रेसियों में नही उनके कर्मांे में रही। ऐसे ही सपा, बसपा, भाजपा फि...

ये लेख कदापि राजनीतिक नही है

ऐसा नही है कि मुझे शिकायतें नही, लेकिन शिकायत करने से पहले अपने कर्मों का हिसाब करना भी तो ज़रूरी है। कहां तक गरूण पुराण के पढ़े जाने की प्रतीक्षा करते रहिएगा, कुछ काम स्वयं भी तो कीजिए...फौरन पता लग जाता है कि आपके साथ हो रहा ग़लत, असल में स्वयं आपकी ही देन है। अब इसका संबंद्ध सत्ताधारी या विपक्षियों से जोड़कर मेरे लेख को राजनीतिक बनाने का कष्ट मत करिएगा। कहने का तात्पर्य एकदम सरल है, उदाहरण के लिए मान लीजिए कोरोना के समय जगह-जगह जाकर खरीददारी कीजिएग ा और बिना सुरक्षा के मटरगश्ती करिएगा तो मृत्यु द्वार आपके और आपके अपनों के लिए बिना प्रयास ही खुल जाऐंगे और इसके लिए न मोदी, न राहुल गांधी और न ही केजरीवाल कोई भी ज़िम्मेदार नही होगा। आप न तो संबित पात्रा और न ही सुरजेवाल किसी से भी व्यथा नही कह सकेंगे, योगी जी भी घास नही डालेंगे और अखिलेश भी आपको या आपके रोते सिर को कंधा देने नही आएंगे। फिर आपस में एक दूसरे को चिकोटी काट कर हम आप असल में अपने ही शरीर पर लाल काले दाग काट रहे हैं। मज़ा तो तब आएगा जब चिकोटी हम आपकी काटें और हम पर केस सुब्रह्यणयम् स्वामी कर दें। जीभ गरमाने भर का प्रपंच बहुत ...

आज किसी के पक्ष विपक्ष में नही केवल आपके हित की बात होगी!

जिन नेताओं, समाज सेवकों कलाकारों और विभूतियों के नाम से हमें नकली ट्वीट और बयान सोशल पटल पर देखने को मिलते हैं, अधिकतर हम उनके वास्तविक होने पर ध्यान ही नही देते। क्या ये एक प्रकार का मानसिक रोग नही है? तो क्या हम रोगी हैं? करोना न सही, सोशल मीडिया ही सही, उद्देश्य तो अपंग बनाने से है, हाथ पैर के साथ साथ मस्तिष्क को भी। क्या आपको कभी कभी यह महसूस नही होता कि आप बिना सोशल मीडिया पर दो चार बेसिर पैर के कमेंट किए अपना दिन बिता सकते हैं? लेकिन नही इन दिनों आप ऐसा सोच भी नही सकते। हम सोशल मीडिया पर ही मौलाना साद को खोजने लगते हैं, हम सोशल मीडिया पर ही विकास दूबे के ब्राहमण होने या अपराधी होने के विषय पर निरर्थक विवाद में उलझे रहते हैं। लाॅक डाउन सही था या ग़लत, और लाॅक डाउन को मानने या न मानने वाले दोनों ही घर की चाहर दीवारी के भीतर दुबक कर ही माबाईल पर ऐसी टिप्पणियां कर रहे थे। कभी कभी सोशल मीडिया को देख कर ऐसा लगने लगता है कि सारा संर्घष और उसका निर्णय आम जनता ही करती है और बड़े से बड़ा देश सोशल मीडिया के हिसाब से ही अपने कदम उठा रहा हो। क्या वास्तविकता वही है जो हम सोच रहे हैं? या हमें ...

गुरू का होना जीवन को मायने देता है

गुरू का होना जीवन को मायने देता है, सोच और विचार को नई दिशा देता है साथ ही उस ज्ञान का भी पूर्नस्मरण कराता है, जो हम जन्म के बाद घर के बड़े बुजु़र्गों और माता पिता से प्राप्त तो करते है किन्तु वह कहीं हमारे सुप्त मस्तिष्क में जाकर बैठ जाता है और व्यवहारिक जीवन में हम उसका प्रयोग नही कर पाते। जब गुरू हमें पुनः उस ज्ञान से परिचित करवाते हैं, उस समय अकसर हमारे मन में यह बात आती है कि यह तो हम पहले से ही जानते थे फिर हमारे मन में पहले यह विचार क्यूं नही आया? यहीं आकर हमें आभास होता है कि गुरू न होते तो क्या होता? जानते तो हम सबकुछ हैं कभी अपने संस्कारों कभी पूर्वजन्म के संस्कारों तो कभी आस पास के वातावरण में भी ऐसा ज्ञान हमारी दृष्टि से होकर गुज़रता है किन्तु हम संभवतः इन्हें दूसरों के लिए छोड़ देते हैं और स्वयं को पूर्ण समझने के अहं में यह भूल जाते हैं कि मनुष्य मात्र के लिए यह सारी जानकारी, गुण, ज्ञान और विचार आदि कितने महत्वपूर्ण हैं। जो अपेक्षा सामने वाले से हम रखते हैं वही अपेक्षाएं अथवा आशा सामने वाला भी हमसे रखता है। आपको ईश्वर नही परखता, आपको आपके सहजन, मित्र, सहयोगी और परिवार ही ...

ईश्वर को ज़िम्मेदार नही ठहरा सकते

कॉरोना वायरस से जूझ रहे दुनिया भर के रोगियों में से कुछ ही ऐसे भाग्यशाली रहे जो और तो कुछ नही लेकिन कम से कम अपनी तकलीफ को लोगों के साथ बांटने में कामयाब रहे। ऐसे तमाम वीडियोज़ में से एक रोंगटे खड़े कर देने वाला एक इटली के युवक का था, जिसका वीडियो कॉलिंग के ज़रिए ब्रूट के एक पत्रकार ने हाल जानने की कोशिश की, अभी वो लड़का जीवित है या नही कह पाना कठिन है किन्तु वीडियो के दौरान लग रहा था कि ये उसकी किसी अन्य व्यक्ति से अंतिम बातचीत रही होगी। 25 साल क ा यह युवक अपने पिता के साथ रह रहा था, और अचानक सुबह का सामान्य जीवन शाम को बुखार और बेहोशी में बदल गया। भयंकर मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुज़रने का ऐसा अनुभव मात्र इस वीडियो को सुन कर ही लगाया जा सकता है। उस युवक का कहना था कि उसने अनजाने में अपने पिता की हत्या तो की ही जो कि 76 वर्ष के थे और इस वायरस को झेल नही सके और इसकी सज़ा मुझे मिल रही है ऐसा महसूस होता है जैसे पिछले 12-14 दिनों से मैं किसी प्लास्टिक के अंदर सांस ले रहा हूं। अब और न लड़ा जाता है न सहा जा रहा है, जल्दी मरना चाहूं तो वो भी संभव नही। मुझे भूख नही लगती, प्यास भी नही, मुझे वो ...

कुछ इस तरह से कांग्रेस की नींव को दोबारा...

एक बार सूख कर खत्म हो चुके पेड़ से गिरे बीज को बोया गया, फिर जैसे ही अंकुर फूटा नया नया माली फल तोड़ने आ गया, फिर कुछ ने कहा कि तुम्हारे परिवार के दूसरे समझदार माली ऐसा कभी नही करते, थोड़ा सा और बढ़ने दो और लोग खा लेंगे, फिर भी जल्दी में अंकुर को ही खोद कर बड़े से गढ्ढे मे ंबो दिया गया। कुछ समय बाद पौधा बड़ा हुआ फिर से नया माली जो थोड़ा कम अक़्ल और कम अनुभवी था आ गया कि इस बार तो फल खाकर ही जाएंगे और फिर से कुछ ने कहा अरे थोड़ा और बढ़ने दो क ुछ औरों को भी मिलता रहेगा लिहाज़ा पौधे को उखाड़ कर खेत मे ंबो दिया गया, रोज़ रोज़ उसमें खाद पानी दिया जाने लगा, और फिर एक दिन अचानक हाट बाज़ार लगने की ख़बर आई तो हड़बड़ी में पौधे पर दवाई और रसायनों का छिड़काव कर उसे जल्दी से बड़ा करने की होड़ लग गई। समय से पहले बड़ा हुआ पौधा और उसके फल वैसे तो किसी काम के न थे पर उन पर तेल पाॅलिश लगा कर और कुछ ब्राण्ड वगैरह की चिपकियां चिपका कर बाज़ार में भेज दिया गया, कसैले अधपके फलों को कुछ मूर्ख पका जान कर खरीद भी ले गए पर ज़्यादातर ग्राहक सयाने निकले थोड़े दागी और गले ही सही पर चमक छोड़ कर देशी फल ही खरीदे। कच्चे फल वक़्त से पह...

बंदूक अपने कंधों पर रख कर चलाना सीखिए...दूसरे के नही!

सही कहा मेरे एक फेसबुकिए मित्र ने कि ज़रूरत से ज़्यादा बेवकूफ और ज़रूरत से ज़्यादा समझदार लोगों में एक ही बुराई होती है, दोंनो ही किसी की नही सुनते। इधर खुद पर भी काफी हंसी आई जब लगातार एक मूर्ख को मैं धारा 370 के एक आलेख पर जवाब देती रही, मुझे एहसास हुआ कि मैं भी वही कर रही हूं जो ये मूर्ख कर रही है। उसने ध्यान से मेरे आलेख को पढ़ा ही नही था, उसे अपना सीमित ज्ञान हम सब तक पहुंचाना था और शायद इतना लिखना उसके बस में नही था तो  उसने मुझे ही सीढ़ी बनाने की सोच ली। अचानक से आया किताबी और अधूरा ज्ञान कितना घातक होता है ये देख कर हंसी से ज़्यादा दहशत हुई, ऐसे ही अधूरे ज्ञान के साथ भारत की युवा पीढ़ी का भविष्य कहां जा रहा है??? इनकी भाषा और विरोध ने जाने अंजाने इन्हें देश के विरूद्ध कर दिया है, उम्र और युवावस्था की तेज़ी में भ्रष्ट बुद्धि के कुछ लोग आपको बिना समझे ही शिक्षा देने लगें तो एक बारगी तनिक कष्ट तो होता है फिर इन्हीं लोगों की बुद्धि और समझ पर दया भी आती है। उस बेचारी को जाने देते हैं क्यूंकि वो एक आधी अधूरी जानकारी और अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार युवा थी, थोड़ा ऊपर उठ कर बात कर...

आपने कर दिखाया

बियर ग्रिल्स का शो वास्तव में दर्शनीय था, ये और बात कि जनता को काफी बार शो के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि चीज़ों, परिस्थितियों और घटनाक्रमों को पूर्वनियोजित तरीके से रचा गया था। वैसे आमतौर पर किसी रिएलिटी शो के बारे में जनता का ध्यान इन पहले से की गई तैयारियों की तरफ नही जाता, परन्तु इस बार काफी खोजबीन और पूछताछ की गई। कुछ लोगों को मज़े का और कुछ को खाली समय बिताने का बेहतरीन मसाला मिल गया, क्या उम्मीद थी आपको कि मोदी एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर कूदते चढ़ते दिखेंगे, 68 की सीमा रेखा पार कर रहे इस बुद्धिजीवी को स्पष्ट ज्ञान है कि देश की जनता वास्तविक से अधिक काल्पनिक नायक पर भरोसा करती है किन्तु जिसे भी जनता नायक मान ले उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को काल्पनिक रूप देकर देखती है तो अकसर वो भी दिखने लगता है जो हुआ ही नही या किया ही नही गया। मोदी को पता है कि जनता क्या चाहती है और ऐसा इस कारण से नही कि वे कुशल राजनीतिज्ञ हैं वरन इस कारण से है कि वे जन साधारण के मस्तिष्क को बड़ी कुशलता से पढ़ पाते हैं और जनता की नब्ज़ परख चुके हैं। चुनाव हों या राष्ट्रहित में लिया गया कोई बड़ा फैसला, कुल मिलाकर मोदी का वार एक...
बियर ग्रिल्स का शो वास्तव में दर्शनीय था, ये और बात कि जनता को काफी बार शो के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि चीज़ों, परिस्थितियों और घटनाक्रमों को पूर्वनियोजित तरीके से रचा गया था। वैसे आमतौर पर किसी रिएलिटी शो के बारे में जनता का ध्यान इन पहले से की गई तैयारियों की तरफ नही जाता, परन्तु इस बार काफी खोजबीन और पूछताछ की गई। कुछ लोगों को मज़े का और कुछ को खाली समय बिताने का बेहतरीन मसाला मिल गया, क्या उम्मीद थी आपको कि मोदी एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर कूदते चढ़ते दिखेंगे, 68 की सीमा रेखा पार कर रहे इस बुद्धिजीवी को स्पष्ट ज्ञान है कि देश की जनता वास्तविक से अधिक काल्पनिक नायक पर भरोसा करती है किन्तु जिसे भी जनता नायक मान ले उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को काल्पनिक रूप देकर देखती है तो अकसर वो भी दिखने लगता है जो हुआ ही नही या किया ही नही गया। मोदी को पता है कि जनता क्या चाहती है और ऐसा इस कारण से नही कि वे कुशल राजनीतिज्ञ हैं वरन इस कारण से है कि वे जन साधारण के मस्तिष्क को बड़ी कुशलता से पढ़ पाते हैं और जनता की नब्ज़ परख चुके हैं। चुनाव हों या राष्ट्रहित में लिया गया कोई बड़ा फैसला, कुल मिलाकर मोदी का वार एक...

बंदूक अपने कंधों पर रख कर चलाना सीखिए...दूसरे के नही!

सही कहा मेरे एक फेसबुकिए मित्र ने कि ज़रूरत से ज़्यादा बेवकूफ और ज़रूरत से ज़्यादा समझदार लोगों में एक ही बुराई होती है, दोंनो ही किसी की नही सुनते। इधर खुद पर भी काफी हंसी आई जब लगातार एक मूर्ख को मैं धारा 370 के एक आलेख पर जवाब देती रही, मुझे एहसास हुआ कि मैं भी वही कर रही हूं जो ये मूर्ख कर रही है। उसने ध्यान से मेरे आलेख को पढ़ा ही नही था, उसे अपना सीमित ज्ञान हम सब तक पहुंचाना था और शायद इतना लिखना उसके बस में नही था तो उसने मुझे ही सीढ़ी बनाने की सोच ली। अचानक से आया किताबी और अधूरा ज्ञान कितना घातक होता है ये देख कर हंसी से ज़्यादा दहशत हुई, ऐसे ही अधूरे ज्ञान के साथ भारत की युवा पीढ़ी का भविष्य कहां जा रहा है??? इनकी भाषा और विरोध ने जाने अंजाने इन्हें देश के विरूद्ध कर दिया है, उम्र और युवावस्था की तेज़ी में भ्रष्ट बुद्धि के कुछ लोग आपको बिना समझे ही शिक्षा देने लगें तो एक बारगी तनिक कष्ट तो होता है फिर इन्हीं लोगों की बुद्धि और समझ पर दया भी आती है। उस बेचारी को जाने देते हैं क्यूंकि वो एक आधी अधूरी जानकारी और अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार युवा थी, थोड़ा ऊपर उठ कर बात करते हैं क...

वास्तव में 370 में सांस कांग्रेस की अटकी थी कश्मीर की नही

बस अब थोड़ा सावधान रहने की आवश्यक्ता है और कुछ नही, कारण भले ही कुछ लोगों ने अपने बच्चों के नाम रावण रख दिए हों परन्तु विभीषण नाम आज तक किसी मां-बाप ने अपने बच्चे के लिए नही चुना। ऐसे ही राज्यसभा के उन 61 वोटों को याद रखना होगा जो देश के विरूद्ध डाले गए। हमारे ही बीच ऐसे कौन लोग हैं जो देश को सम्पूर्ण रूप में नही देखना चाहते, और ऐसा है भी तो क्यूं? देश के टुकड़े होने से उन्हें क्या और कैसा लाभ मिल रहा है यदि केवल इस पर विचार करिएगा तो भी आपको उन देशद्रोहियों के नाम बगैर खोजे मिल जाएंगे। लगातार 70 वर्षों तक देश को आधा अधूरा बनाकर रखने के बाद आज देश को पूरा देखकर जिन्हें खुशी नही हो रही वो देश के सगे तो नही हो सकते अलबत्ता उन्हें अपने वोट बैंक में ज़रूर कुछ कमी महसूस हो रही होगी और सत्ता लोलुप जन्तुओं के लिए वोट का नुकसान सभी नुकसानों से बड़ा है, अन्यथा ये तथ्य वास्तव में सोच का विषय है कि केवल जम्मू कश्मीर के नेताओं के बच्चे ही वहां के स्थानीय स्कूलों में नही जाते सभी विदेशी स्कूलों में पढ़कर आए हैं या अभी भी पढ़ रहे हैं। कश्मीर की ग़रीबी वहां के आस पास के इलाकों का पिछड़ापन साफ नज़र आता ...

इस बार पकड़ में आया है तो जाने मत देना

आज़म खान को समझना और समझाना दोनों ही बेहद ज़रूरी है, वरना इसकी जीभ फिसलते हुए किस किस को चाट कर घायल करती जाएगी इसका अभी आपको अंदाज़ा नही है। हांलाकि हमें देष के काम के लिए एक ऐसे ही तेज़ाबी जीभ वाले की ज़रूरत थी जो पाकिस्तान जाकर भारत की तरफ से बात-चीत कर सके, लेकिन क्या कहें कि ये कमबख़्त गद्दार निकला जो खुद ही पाकिस्तान जाकर रहना चाहता है। वो तो कब्ज़ा किए हुए ज़मीनों का मोह है जो छूट नही रहा वरना कब का चला गया होता। उन ज़मीनों को बेचे भी तो किसे ? आजकल कुछ भी छुपा हुआ और गोपनीय नही रहता, ऐसे में ज़मीन का सौदा चुपचाप हो ये कैसे संभव है? फिलहाल वक़्त काटने और मुफ्त की शोहरत पाने का सबसे बेहतरीन तरीका जो आज़म जानते हैं वो सिर्फ औरतों के अलावा और कुछ नही हो सकता। किसी औरत की किस तरह बेइज़्ज़ती की जाती है ये कोई इनसे सीखे, एकदम सटीक और अचूक तंज कसने छिछोरी शेरो-षायरी वगैरह आज़म के पुराने अस्त्र रहे हैं। ऐसे में जया प्रदा हों या फिर भाजपा सांसद रमा देवी या फिर कल को कोई और स्त्री कोई फर्क नही पड़ेगा, आज़म ढीठ थे और रहेंगे। अपने बुरे बीते बचपन की यादों का विषाद और कुण्ठा लेकर एक ड्रामेबाज़ की तरह ज़िन...

हिन्दू होने के नाते इतना तो कीजिए...

बाबर से लेकर औरंगज़ेब तक की देश की गुलामी जिसे इतिहास में छुपा दिया गया, अंग्रेज़ों द्वारा किए गए कार्यों को देशहित से जोड़कर पढ़ाना और हर वास्तविक जानकारी को घुमा फिरा कर परोसने के लिए इन इतिहासकारों को क्या प्रस्ताव दिया गया होगा इस बारे में कुछ कह पाना कठिन है क्यूंकि देश के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने की सज़ा देशद्रोह से कम नही हो सकती और देशद्रोह की एकमात्र सज़ा मृत्युदण्ड ही होना चाहिए, किन्तु ये इतिहासकार अपने अपने हिस्से की शान और आराम की ज़िन्दगी जी कर कहीं मिट्टी में दफ्न हो गए तो कहीं जलाकर इनकी अस्थियों का विसर्जन कर दिया गया, और मरणोंपरान्त इनके रचे गए झूठ अमर हो गए कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी विदेशी आक्रमणकारियों को ही अपना उद्धारक और देश का भूत, भविष्य और वर्तमान मान ले। क्या आपको या आपके बच्चों को पता है कि लालकिले के ठीक सामने शिवालय का निर्माण करवा कर बाज़ीराव पेशवा ने हिन्दुओं के गौरवशाली इतिकास को और भी महान बना दिया। औरंगजे़ब में साहस नही था कि वो किले से बाहर आकर बाजीराव को रोक सकता या चुनौती दे सकता, किन्तु आम जनता को औरंगज़ेब की औकात पता चल चुकी थी। देशभक्ती और बलिदा...

क्यूंकि नज़र होती ही है बदलने के लिए...

गृहयुद्ध की ओर बढ़ते इन कदमों को किसी न किसी उपाय से रोकना ही होगा, देश का प्रधान सेवक भी मौके की गंभीरता से अनभिज्ञ नही है किन्तु कोई तो कारण होगा ही कि फिलहाल चुप है। दाउद इब्राहीम की नई तस्वीर का मिलना और ज़किर नाईक का पकड़ा जाना कहीं न कहीं चुप रहने के पीछे कोई नई कहानी बुन रहा है। कैसी कहानी...? तेल की मजबूरी, तो कहीं न कहीं पाकिस्तान के साथ नर्मी बरतने की बात पर समझौता या फिर कुछ और ही चल रहा है उस दिमाग के भीतर? वोट देकर अफसोस करने वालों को कल एक बार फिर अपने अफसोस पर भी अफसोस होगा। युद्ध के नियमों से अपरिचित लोग भी अभी नही जानते कि युद्ध का हर नियम जायज़ ठहराने के पीछे भी कई राज़ छुपे थे। आप सीधा हमला भी करते थे, भूखा रख कर फिर भोजन का लालच दिखा कर काबू कर लेते थे, आप कभी यूं भी करते थे कि जो सहूलियत आपको आपका शासक नही दे सका उन्हीं चीज़ों को देने का वायदा करके भी आप किलों के बन्द दरवाज़े खुलवा कर जीत हासिल कर लेते थे। हर हाल में जनता ही होती थी जो सामने वाले का शिकार बनती थी, कभी हिन्दू मुग़लों का और कभी मुग़ल हिन्दुओं का! ऐसे ही किसी अदृश्य युद्ध का हम और आप शिकार बने हुए हैं, समय ...

जिसका काम उसी को साजे

फिल्मी कलाकारों का बेरोज़गारी और फिल्म की असफलताओं के दौरान समय व्यतीत करने या सस्ती लोकप्रियता की चाह ने फिल्म को जाने अंजाने राजनीति से जोड़कर देखना आरंभ कर दिया , सारी गंदगी की शुरूआत यहीं से हुई। देखते देखते अचानक 1995-96 में ऐसा दौर आया कि संपूर्ण कला जगत पर राजनीति तेज़ी से हावी होने लगी , और आज ये हाल है कि हर किस्म के छोटे बड़े भूले बिसरे और अपने खत्म होते करियर को सीधा जनमंच पर चमकाने के लिए हर क्षेत्र हर कला से जुड़ा कलाकार और व्यवसायी राजनीति का हिस् सा बन जाता है। दो नावों पर पैर रखने का नतीजा कांग्रेस के समय में लोग अमिताभ बच्चन और भाजपा के समय में विनोद खन्ना की शक्ल में देख चुके हैं , या तो आप देश सेवा करें या आत्म सेवा , या व्यवसाय करें या राजनीति या तो आप कुशल कलाकार है या फिर कुटिल राजनीतिज्ञ आप दोनों नही हो सकते , कभी नही। अगर आप की जीभ अचानक देश और धर्म के प्रति ज़हर उगलने लगी है तो आपको राजनीति की छूत लग चुकी है और अब आप कलाकार की श्रेणी से बाहर हैं , केवल अपनी बात को रखने के नाम पर जो स्वतंत्रता हमारे भारत का संविधान देता है उसका दुरपयोग करना यदि आप सीख गए हैं तो ...